Singrauli Pollution News : सिंगरौली/चितरंगी। देश की ऊर्जा राजधानी सिंगरौली में औद्योगिक विकास की चमक अब स्थानीय ग्रामीणों के लिए अंधेरा साबित हो रही है। चितरंगी विकासखंड के महदेइया गांव में संचालित ‘महावीर कोल रिसॉर्सेस’ की कोल वॉशरी वर्तमान में एक बड़े पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संकट का केंद्र बन गई है। वॉशरी से निकलने वाली कोयले की धूल और दूषित पानी ने करीब 10 किलोमीटर के दायरे में रहने वाले हजारों लोगों का जीना दूभर कर दिया है।
सांसों में घुलता कोयले का चूरा स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, वॉशरी परिसर में कोयले के विशाल ढेरों को खुला छोड़ दिया गया है। हवा चलते ही कोयले की महीन धूल बवंडर बनकर घरों, रसोई और लोगों के फेफड़ों तक पहुँच रही है। आलम यह है कि बच्चे और बुजुर्ग दमा, खांसी और त्वचा संबंधी बीमारियों की चपेट में हैं। प्रदूषण के इसी तांडव के कारण कई परिवारों ने गांव से पलायन करना शुरू कर दिया है।
खेती और जल स्रोत पर मंडराता खतरा प्रदूषण का असर केवल हवा तक सीमित नहीं है। ग्रामीणों का आरोप है कि वॉशरी का काला पानी बिना ट्रीटमेंट के स्थानीय नालों के जरिए बिजुल नदी में बहाया जा रहा है। यही नदी मोरवा क्षेत्र, सिंगरौली रेलवे स्टेशन और करैला के हजारों लोगों के लिए पेयजल का मुख्य स्रोत है। इसके अलावा, बरसात के मौसम में यह जहरीला पानी खेतों में जमा हो जाता है, जिससे फसलों पर काली परत जम रही है और जमीन की उपजाऊ शक्ति खत्म हो रही है।
प्रशासनिक मौन पर उठते सवाल नियमों के मुताबिक, किसी भी उद्योग को बिना शोधन (Treatment) के दूषित जल बाहर छोड़ने की अनुमति नहीं है। इसके बावजूद, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और स्थानीय प्रशासन की चुप्पी पर सवाल उठ रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि कई बार शिकायतों के बाद भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है, जिससे उद्योग संचालकों के हौसले बुलंद हैं। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाती है, बल्कि विकास के उस मॉडल पर भी सवाल उठाती है जो पर्यावरण की कीमत पर खड़ा है।









