Friday, June 12, 2026
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Child Labour Racket: रायपुर की लोहा फैक्ट्री में चल रहा था मासूमों का शोषण, अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा ने मारा छापा

Child Labour Racket: रायपुर। विश्व बाल श्रम निषेध दिवस के विशेष अवसर पर छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग के नेतृत्व में मासूमों के बचपन को सुरक्षित करने के लिए प्रदेशभर में एक साथ चौतरफा बड़ी कार्रवाई की गई है। राजधानी रायपुर समेत विभिन्न संवेदनशील क्षेत्रों में चलाए गए इस रेस्क्यू ऑपरेशन के तहत कुल बीस नाबालिग बच्चों को श्रम के दलदल से मुक्त कराकर शासकीय संरक्षण में लिया गया है। विभागीय आंकड़ों के मुताबिक, रायपुर के उरला औद्योगिक क्षेत्र से नौ नाबालिग बच्चों, बिलासपुर में रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) के माध्यम से सात बच्चों और रायपुर शासकीय रेलवे पुलिस (जीआरपी) की मुस्तैदी से चार बच्चों का रेस्क्यू करने में बड़ी सफलता मिली है। इस बड़ी संयुक्त कार्रवाई से सूबे के अवैध बाल श्रम कराने वाले नियोजकों और बिचौलियों के बीच हड़कंप मच गया है।

लोहे की फैक्ट्री में जोखिमपूर्ण काम करते मिले मासूम

बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा के प्रत्यक्ष नेतृत्व में एक विशेष जांच दल का गठन किया गया था, जिसने राजधानी के औद्योगिक हब उरला स्थित ‘मारुति नंदन स्ट्रक्चर इंडस्ट्रीज’ में अचानक औचक छापामार कार्रवाई की। इस औचक निरीक्षण के दौरान फैक्ट्री के भीतर का नजारा बेहद भयावह और विचलित करने वाला था। भारी-भरकम लोहे की इस फैक्ट्री में बेहद कम उम्र के नाबालिग बच्चों से भट्टी और मशीनों के आसपास बेहद गंभीर व जोखिमपूर्ण प्रकृति का कार्य कराया जा रहा था, जिससे उनकी जान को हर वक्त खतरा बना हुआ था। जांच टीम ने मौके की संवेदनशीलता को देखते हुए वहां काम कर रहे नौ बच्चों को तत्काल अपने संरक्षण में लिया और वैधानिक पंचनामा तैयार कर उन्हें बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) के समक्ष प्रस्तुत किया।

बिहार के ठेकेदार के जरिए अंतरराज्यीय तस्करी का खुलासा

रेस्क्यू किए गए इन मासूम बच्चों से जब पुलिस और विभागीय परामर्शदाताओं ने बेहद आत्मीय माहौल में प्रारंभिक पूछताछ की, तो बाल तस्करी के एक बड़े अंतरराज्यीय नेटवर्क का खुलासा हुआ। पीड़ित बच्चों ने रोते हुए बताया कि वे छत्तीसगढ़ के निवासी नहीं हैं, बल्कि उन्हें ओडिशा, उत्तर प्रदेश के बरेली और पश्चिम बंगाल के आसनसोल जैसे दूरदराज के इलाकों से बहला-फुसलाकर यहां लाया गया था। बच्चों को रायपुर लाने और इस दलदल में धकेलने का मुख्य काम बिहार के रहने वाले एक रसूखदार ठेकेदार ने किया था। सरगर्मी से जांच कर रही पुलिस और आयोग की टीमें अब इस मामले से जुड़े मुख्य ठेकेदार, स्थानीय मददगारों और अंतरराज्यीय बाल तस्करी के सभी कड़े पहलुओं की बेहद गहराई से जांच कर रही हैं।

शोषकों के खिलाफ किशोर न्याय अधिनियम के तहत केस दर्ज

प्रकरण की शुरुआती जांच में ही बच्चों के साथ अमानवीय क्रूरता करने, उनका आर्थिक व शारीरिक शोषण करने और कानून का उल्लंघन कर अवैध रूप से जोखिमपूर्ण कारखानों में काम पर रखने के पुख्ता तथ्य सामने आ चुके हैं। इसके आधार पर मारुति नंदन स्ट्रक्चर इंडस्ट्रीज के प्रबंधन और संबंधित ठेकेदार के विरुद्ध किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 75, 79 और 143 के तहत कड़ा आपराधिक मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। श्रम विभाग के अधिकारियों का कहना है कि वे इस मामले में बाल श्रम प्रतिषेध कानून की अन्य गैर-जमानती धाराओं को भी जोड़ने के लिए कानूनी प्रक्रिया पूरी कर रहे हैं ताकि दोषियों को अधिकतम सजा दिलाई जा सके।

दोषियों को मिलेगी सख्त से सख्त सजा: डॉ. वर्णिका शर्मा

इस पूरे मामले पर कड़ा रुख अख्तियार करते हुए छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा ने दो टूक शब्दों में कहा कि बाल श्रम मासूम बच्चों के मौलिक अधिकारों का सबसे गंभीर और अक्षम्य उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि जब बच्चों से उनकी उम्र के विपरीत जोखिमपूर्ण भारी उद्योगों में काम कराया जाता है, तो यह उनके पूरे भविष्य को अंधकार में धकेल देता है। प्रत्येक बच्चे को एक सुरक्षित बचपन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सम्मानजनक जीवन जीने का पूरा संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। आयोग बाल श्रम और बाल तस्करी जैसी सामाजिक कुप्रथाओं के समूल नाश के लिए पूरी प्रतिबद्धता के साथ काम कर रहा है। उन्होंने साफ किया कि इस मामले के किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा और सभी बच्चों के सुरक्षित पुनर्वास की व्यवस्था की जाएगी।

पुनर्वास और चिकित्सकीय सहायता की प्रक्रिया शुरू

इस बेहद सफल और बड़े रेस्क्यू ऑपरेशन को धरातल पर उतारने में जिला बाल संरक्षण अधिकारी संजय निराला, विपिन ठाकुर, राज्य श्रम विभाग की उड़नदस्ता टीम और स्थानीय पुलिस प्रशासन के संबंधित अधिकारियों की संयुक्त व सराहनीय भूमिका रही। आयोग ने स्पष्ट किया है कि मुक्त कराए गए सभी बीस बच्चों को केवल उनके घर भेजना ही प्राथमिकता नहीं है, बल्कि उन्हें आवश्यक मानसिक परामर्श, उच्च स्तरीय चिकित्सकीय सहायता, मुफ्त शिक्षा और शासकीय पुनर्वास की मुख्यधारा से जोड़ा जा रहा है। इसके विपरीत, बच्चों के मूल राज्यों के जिला प्रशासनों से भी संपर्क स्थापित कर उनके परिजनों की तलाश तेज कर दी गई है।

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