Saturday, September 5, 2026
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CG News: बिलासपुर HC का बड़ा फैसला! पत्नी की सैलरी पति से हो ज्यादा, तब भी मिलेगा मुकदमे का खर्च

Chhattisgarh High Court Verdict: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट फैसला एक वैवाहिक विवाद के मामले में चर्चा का विषय बन गया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि पत्नी की आय पति से अधिक भी हो, तब भी उसे अदालत में मुकदमे की पैरवी के लिए यात्रा, भोजन और अन्य जरूरी खर्च पाने का अधिकार है।हाईकोर्ट ने कहा कि इस तरह की सहायता का उद्देश्य जीवन-यापन नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करना है।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट फैसला अंबिकापुर निवासी आशीष राय और विश्रामपुर निवासी अंजलि राय के वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। पति ने सूरजपुर स्थित कुटुंब न्यायालय में तलाक की याचिका दायर की थी।सुनवाई के दौरान पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत अंतरिम भरण-पोषण और मुकदमे के खर्च की मांग की।

पति ने आय का दिया था हवाला
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट फैसला से पहले पति ने अदालत में दस्तावेज पेश कर बताया कि पत्नी एक सरकारी शिक्षिका हैं और उन्हें लगभग 71 हजार रुपये मासिक वेतन मिलता है।वहीं पति ने दावा किया कि वह संविदा आयुष चिकित्सा अधिकारी के रूप में करीब 25 हजार रुपये प्रतिमाह कमाते हैं। इसी आधार पर उन्होंने कहा कि पत्नी किसी अतिरिक्त आर्थिक सहायता की पात्र नहीं हैं।
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कुटुंब न्यायालय ने क्या कहा था?
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट फैसला से पहले कुटुंब न्यायालय ने माना था कि पत्नी स्वयं अपना भरण-पोषण करने में सक्षम हैं, इसलिए उन्हें मासिक गुजारा भत्ता देने की जरूरत नहीं है।हालांकि अदालत ने मुकदमे की पैरवी के लिए 3,000 रुपये एकमुश्त खर्च और प्रत्येक सुनवाई के लिए यात्रा एवं भोजन व्यय के रूप में 1,000 रुपये देने का आदेश दिया था।

हाईकोर्ट ने बरकरार रखा आदेश
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट फैसला सुनाते हुए मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभू दत्त गुरु की खंडपीठ ने कुटुंब न्यायालय के आदेश को सही माना।अदालत ने कहा कि वैवाहिक मामलों में पक्षकारों को कई बार अदालत आना-जाना पड़ता है, जिससे यात्रा और अन्य खर्च होना स्वाभाविक है। इसलिए ऐसे खर्च की व्यवस्था करना न्यायसंगत है।

यह भरण-पोषण नहीं, मुकदमे का खर्च है
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट फैसला में अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यह राशि जीवन-यापन या भरण-पोषण के लिए नहीं दी जा रही है।इसका उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि संबंधित पक्ष बिना आर्थिक बाधा के अदालत की कार्यवाही में शामिल हो सके और अपना पक्ष प्रभावी तरीके से रख सके।

पति की दलीलें नहीं मानी गईं
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट फैसला में अदालत ने यह भी कहा कि 1,000 रुपये प्रति सुनवाई और 3,000 रुपये एकमुश्त खर्च कोई अत्यधिक या अनुचित राशि नहीं है।साथ ही पति की ओर से ऐसा कोई ठोस प्रमाण भी प्रस्तुत नहीं किया गया जिससे यह साबित हो कि इस खर्च से उन पर असहनीय आर्थिक बोझ पड़ेगा।

अपील खारिज, आदेश कायम
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट फैसला में खंडपीठ ने कहा कि कुटुंब न्यायालय का आदेश पूरी तरह न्यायसंगत, विवेकपूर्ण और कानून के अनुरूप है।अदालत को निचली अदालत के आदेश में किसी प्रकार की कानूनी या अधिकार क्षेत्र से जुड़ी त्रुटि नहीं मिली। इसी आधार पर पति की अपील को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया गया।

क्यों अहम है यह फैसला?
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट फैसला वैवाहिक विवादों से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी संदेश देता है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि मुकदमे का खर्च तय करते समय केवल आय की तुलना ही आधार नहीं हो सकती।यदि किसी पक्ष को न्यायिक प्रक्रिया में शामिल होने के लिए खर्च वहन करना पड़ रहा है, तो उसे उचित सहायता देने का अधिकार कानून के तहत उपलब्ध है।

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