Mojo Mushroom Factory Case : दोबारा बालश्रम! रायपुर में फिर मोजो मशरूम-बिस्किट फैक्ट्री से 109 बच्चों का रेस्क्यू, कब जागेगी सरकार…

रायपुर: राजधानी रायपुर एक बार फिर बालश्रम और बंधक मजदूरी के जाल से दहल गया है। खरोरा स्थित मोजो मशरूम फैक्ट्री और बिस्किट मैन्युफैक्चरिंग यूनिट में श्रम विभाग और एनएचआरसी की संयुक्त कार्रवाई में 109 बच्चों को रेस्क्यू किया गया। बीते सोमवार शाम हुई छापेमारी में फैक्ट्रियों में लंबे समय से चल रहे अवैध श्रम प्रथाओं, बुरी कार्य स्थितियों और संगठित शोषण का चौंकाने वाला नेटवर्क सामने आया।

छापे में सामने आया बालश्रम का काला सच
एनएचआरसी और श्रम विभाग की टीम ने सड्डू और खरोरा स्थित यूनिट्स में सघन तलाशी ली। 68 लड़कियां और 41 लड़के अलग-अलग सेक्शनों में काम करते मिले—कुछ पैकेजिंग में, कुछ मशीनों के पास, और कई खतरनाक जगहों पर।
इन बच्चों की उम्र 10 से 16 वर्ष के बीच बताई जा रही है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल—एक ही फैक्ट्री पर बार-बार छापे क्यों? क्या प्रशासन सोया हुआ था?

यह पहला मामला नहीं है। बीते 11 जुलाई 2025 को भी इसी मशरूम फैक्ट्री से 97 मजदूरों को बंधन से मुक्त कराया गया था।फिर भी फैक्ट्री चलती रही, मजदूरों को दोबारा लाया जाता रहा, बालश्रम जारी रहा।

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अब बड़ा सवाल यह है कि—

  • पहले छापे के बाद हीस फैक्ट्री को बंद क्यों नहीं किया गया?
  • कैसे दोबारा इतनी बड़ी संख्या में बच्चियों और बच्चों को अंदर काम पर लगा दिया गया?
  • कौन से अधिकारी इस पूरे ऑपरेशन पर आंख बंद किए बैठे थे?
  • क्या सरकारी विभागों की ढिलाई ने बच्चों को फिर नरक में धकेल दिया?

इन सवालों के जवाब अभी तक राज्य सरकार से नहीं मिले हैं।

मजदूरों की कहानी रोंगटे खड़े करने वाली

बीते दो जुलाई को भागकर निकले मजदूरों ने बताया था कि उन्हें धोखे से मशरूम पैकिंग के नाम पर लाया गया था। कहा गया कि “बैठकर 2000 रुपये कमाओ”… लेकिन हकीकत थी—

  • 24-24 घंटे काम,
  • समय पर खाना नहीं,
  • मारपीट,
  • महिलाओं पर भी अत्याचार,
  • संपर्क की पूरी पाबंदी,
  • रात में कमरों में बंद कर दिया जाना।

मजदूरों ने कहा — “एक को मार पड़ती थी तो इससे 50 लोगों की हालत खराब हो जाती थी।”

प्रशासन की भूमिका पर तीखे सवाल—FIR में 5 दिन की देरी किसके आदेश पर?

इस बाबत बीते 11 जुलाई को हुई इस कारवाई पर बजरंग दल का आरोप था कि उन्होंने लगातार FIR और रेस्क्यू की मांग की थी, लेकिन तब 5 दिनों तक प्रशासन ने कार्रवाई नहीं की।क्या यह महज़ लापरवाही थी या सिस्टम में किसी की मिलीभगत? ऐसे में अगर पहले दिन FIR दर्ज हो जाती, तो क्या 109 बच्चे फिर से उसी नरक में नहीं धकेले जाते?

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राज्य सरकार पर नैतिक और प्रशासनिक सवाल

अब राज्य सरकार के सामने सीधे सवाल खड़े हो रहे हैं—

  • क्या श्रम विभाग केवल छापा मारने तक सीमित है?
  • क्या लाइसेंस रद्द करने और मालिकों पर कठोर IPC धाराएं लगाने का साहस सरकार दिखाएगी?
  • क्या बालश्रम का यह पूरा रैकेट किसी राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण में फल-फूल रहा है?
  • क्या सरकार बताएगी कि महीनों से मजदूरों की शिकायतें क्यों अनसुनी की गईं?

जांच जारी, लेकिन जवाब अभी भी अधूरे

फिलहाल  रेस्क्यू किए गए सभी बच्चों को सुरक्षित आश्रय में भेज दिया गया है। फैक्ट्री मालिकों और ठेकेदारों पर कठोर कार्रवाई की बात कही जा रही है, मगर जनता अब सिर्फ कार्रवाई नहीं—जवाब चाहती है।

रायपुर बालश्रम कांड पर 10 तीखे सवाल — इसके जवाब किसके पास?

1. 11 जुलाई की छापेमारी के बाद फैक्ट्री को सील क्यों नहीं किया गया?

जब पहले ही 97 लोग बंधन से मुक्त कराए गए थे, तो फैक्ट्री दोबारा कैसे चलने लगी?

2. श्रम विभाग ने पिछली कार्रवाई के बाद मॉनिटरिंग क्यों नहीं की?

क्या बालश्रम जैसी भयावह प्रथा पर फॉलो-अप करना विभाग के एजेंडा में नहीं था?

3. प्रशासन ने 5 दिन तक FIR दर्ज करने में देरी क्यों की?

क्या यह साधारण लापरवाही थी या किसी बड़े दबाव का नतीजा?

4. 109 बच्चों को फैक्ट्री तक लाने वाला पूरा नेटवर्क कौन चला रहा है?

क्या यह संगठित ट्रैफिकिंग रैकेट है? और कौन इसके पीछे है?

5. राज्य सरकार बताए कि फैक्ट्री मालिक और ठेकेदार अब तक जेल के बाहर क्यों हैं?

क्या गंभीर अपराधों में भी “कार्रवाई होगी” बोलकर बच निकलना नई परंपरा बन गई है?

6. क्या यह पूरा ऑपरेशन प्रशासनिक संरक्षण में चल रहा था?

इतनी बड़ी संख्या में बंधक मजदूर… क्या कोई अधिकारी यह सब “देख” नहीं रहा था?

7. दो बार छापेमारी के बाद भी मालिकों के लाइसेंस रद्द क्यों नहीं हुए?

क्या राज्य में फैक्ट्रियाँ बच्चों की कब्रगाह बन चुकी हैं?

8. मजदूरों की शिकायतें महीनों से अनसुनी क्यों रहीं?

जब मजदूर 20 किलोमीटर पैदल चलकर पुलिस तक पहुंचे, तब भी कार्रवाई क्यों टाली जाती रही?

9. महिला बाल विकास और श्रम विभाग में समन्वय की विफलता का जिम्मेदार कौन?

जब पहले भी मामला सामने आ चुका था, तो दोनों विभागों ने संयुक्त निगरानी क्यों नहीं की?

10. क्या राज्य सरकार इस पूरे मामले की हाई-लेवल, टाइम-बाउंड जांच कराएगी?

या यह मामला भी कुछ दिनों बाद भूल-भुलैया में दब जाएगा?

 

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