नई दिल्ली : महिला अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और दावा किया कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के बावजूद उन्हें सेना में स्थायी कमीशन (Permanent Commission) का बराबर मौका नहीं मिल रहा है।
सुनवाई में उठे सवाल
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सूर्यकांत ने सवाल किया कि क्या सरकार ‘नितिशा जजमेंट’ का लाभ सभी महिला अधिकारियों को नहीं दे रही। इस पर अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ने बताया कि लाभ तभी दिया जा सकता है जब महिला अधिकारी स्वयं स्थायी कमीशन के लिए आवेदन करें।
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आवेदन में अंतर
ASG ने अदालत को बताया कि कुल पुरुष अधिकारियों में से लगभग 93% ने स्थायी कमीशन के लिए आवेदन किया, जबकि महिलाओं में यह आंकड़ा 79% था। शुरुआती बैचों में पुरुष अधिकारियों के आवेदन 50-90% के बीच थे, जबकि महिलाओं में 50% से भी कम। हाल के वर्षों में अनुपात लगभग बराबर होकर 60% तक पहुंच गया, लेकिन स्थायी कमीशन पाने वालों में पुरुषों का 54% और महिलाओं का 42% रहा।
भेदभाव के आरोपों पर बहस
ASG ने बताया कि पहले महिला अधिकारियों को उनकी ACR (Annual Confidential Report) में नकारात्मक अंक मिलते थे, जिससे उन्हें स्थायी कमीशन की सिफारिशें नहीं मिल पाती थीं। अब यह व्यवस्था बदल गई है और महिलाओं के खिलाफ भेदभाव नहीं किया जा रहा। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि अगर पहले भेदभाव नहीं होता, तो और अधिक योग्य महिला अधिकारी स्थायी कमीशन पा सकती थीं।
सरकार का पक्ष
सरकार का कहना है कि सेना में चयन योग्यता पर आधारित होना चाहिए, चाहे उम्मीदवार पुरुष हो या महिला। भर्ती के स्तर पर महिलाओं के लिए अलग व्यवस्था है, लेकिन चयन प्रक्रिया समान होनी चाहिए। 2012 से पहले महिलाओं को ‘एक्स-सर्विसमैन’ का दर्जा नहीं मिलता था, लेकिन अब नीतियों में बदलाव कर महिलाओं को बराबरी का अवसर दिया जा रहा है।
आंकड़े : अब तक 237 महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन मिल चुका है।









