Vedanta plant accident: सक्ती: छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले में स्थित वेदांता थर्मल पावर प्लांट में हुए भीषण हादसे ने कई परिवारों की खुशियां छीन लीं। इस हादसे में कई मजदूरों की जान चली गई, जिनमें जमगहन गांव के रहने वाले 32 वर्षीय थंडाराम लहरे भी शामिल थे। हादसे के बाद उनके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। सबसे ज्यादा दर्द उस समय महसूस होता है जब उनकी तीन साल की बेटी अपनी मां से बार-बार पूछती है, “मम्मी, पापा कब आएंगे?”
इस मासूम सवाल का जवाब मां यशोदा लहरे के पास नहीं है। बेटी की बात सुनते ही उनकी आंखों से आंसू निकल पड़ते हैं। घर में अब सन्नाटा पसरा हुआ है और परिवार के हर सदस्य की आंखों में अपने बेटे, पति और पिता को खोने का दर्द साफ दिखाई देता है।
एक धमाके ने बदल दी पूरी जिंदगी
14 अप्रैल की दोपहर सक्ती जिले के सिंघीतरई स्थित वेदांता पावर प्लांट में अचानक स्टीम पाइप फटने से जोरदार धमाका हुआ। हादसा इतना भयानक था कि कई मजदूर गंभीर रूप से झुलस गए। इनमें थंडाराम लहरे भी शामिल थे। इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।
थंडाराम अपने परिवार के इकलौते कमाने वाले सदस्य थे। उनके जाने के बाद पत्नी यशोदा और दो छोटी बेटियों का भविष्य अनिश्चित हो गया है। परिवार के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आगे जीवन कैसे चलेगा।
बेटियों को आज भी है पिता के लौटने का इंतजार
हादसे को कई दिन बीत चुके हैं, लेकिन थंडाराम की तीन साल की बेटी श्रद्धा अब भी अपने पिता का इंतजार कर रही है। वह रोज अपनी मां से पूछती है कि पापा कब आएंगे। उसकी बड़ी बहन प्रियांशी भी कभी-कभी पिता को याद कर रो पड़ती है।
यशोदा बताती हैं कि जब बच्चे पिता के बारे में पूछते हैं तो उनके पास कोई जवाब नहीं होता। वह खुद को संभाल नहीं पातीं और अकेले में रोने लगती हैं। बच्चों को समझाना उनके लिए सबसे मुश्किल काम बन गया है।
परिवार ने लगाए गंभीर आरोप
मृतक थंडाराम लहरे के परिजनों ने वेदांता प्रबंधन और अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। परिवार का कहना है कि थंडाराम की नियुक्ति ऑफिस बॉय के रूप में हुई थी। उनका काम कार्यालय में साफ-सफाई करना और चाय-नाश्ता पहुंचाना था।
परिजनों का आरोप है कि हादसे वाले दिन अधिकारियों ने उन्हें उस स्थान पर भेजा जहां तकनीकी खराबी की जानकारी पहले से थी। बताया जा रहा है कि वहां की फोटो और वीडियो लेने के लिए उन्हें दो अन्य कर्मचारियों के साथ भेजा गया था। इसी दौरान अचानक स्टीम पाइप फट गई और बड़ा हादसा हो गया।
परिवार का कहना है कि जिस काम के लिए थंडाराम को रखा गया था, उससे अलग काम उनसे करवाया जाता था। अगर उन्हें उस जगह नहीं भेजा जाता तो शायद आज वह जीवित होते।
बूढ़े पिता की चिंता
थंडाराम के पिता केवल लहरे अपने बेटे को खोने के बाद गहरे सदमे में हैं। वह अपनी बहू और पोतियों को देखकर चिंतित हो जाते हैं। उनका कहना है कि अब उनकी उम्र भी काफी हो चुकी है। ऐसे में बहू और बच्चों की जिम्मेदारी कौन उठाएगा, यह सोचकर वह परेशान रहते हैं। उनकी आंखों में बेटे को खोने का दुख और परिवार के भविष्य की चिंता साफ दिखाई देती है।
मुआवजा मिला, लेकिन दर्द कम नहीं हुआ
कंपनी की ओर से मृतक परिवार को मुआवजा दिया गया है, लेकिन यशोदा का कहना है कि किसी इंसान की जिंदगी की कोई कीमत नहीं हो सकती। उनका कहना है कि पैसे से उनके पति वापस नहीं आ सकते।
परिवार का आरोप है कि मुआवजे की प्रक्रिया भी आसान नहीं थी। उन्हें कई बार फोन कर कोरबा बुलाया गया। अपने खर्च पर वहां जाना पड़ा और घंटों इंतजार के बाद चेक दिया गया। परिवार का कहना है कि हादसे के बाद कई दिनों तक कंपनी का कोई अधिकारी उनके घर संवेदना व्यक्त करने तक नहीं पहुंचा।
दूसरे परिवारों का भी यही दर्द
इस हादसे में जान गंवाने वाले अन्य मजदूरों के परिवार भी इसी तरह के दर्द से गुजर रहे हैं। कई परिवारों ने आरोप लगाया है कि हादसे के बाद उन्हें पर्याप्त सहयोग नहीं मिला।
मृतकों के परिजनों का कहना है कि हादसे के बाद कंपनी की ओर से संवेदनशील व्यवहार की उम्मीद थी, लेकिन उन्हें केवल औपचारिकताएं पूरी होती नजर आईं। उनका कहना है कि मजदूरों की जान को गंभीरता से नहीं लिया गया।
24 से ज्यादा मजदूरों की गई जान
वेदांता प्लांट में हुए इस हादसे में कई मजदूर बुरी तरह झुलस गए थे। इलाज के दौरान लगातार मौतों का आंकड़ा बढ़ता गया। इस दुर्घटना में 24 से अधिक मजदूरों की जान चली गई। इनमें छत्तीसगढ़ के अलावा झारखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के श्रमिक भी शामिल थे, जो रोजगार की तलाश में यहां आए थे। इन मजदूरों के परिवार अब अपने प्रियजनों के बिना जीवन बिताने को मजबूर हैं।
जिम्मेदारों पर कार्रवाई की मांग
मृतकों के परिजन और ग्रामीण हादसे के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि यदि अधिकारियों को पहले से तकनीकी खराबी की जानकारी थी, तो सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम क्यों नहीं किए गए।
परिवारों का कहना है कि केवल मुआवजा देना पर्याप्त नहीं है। उन्हें न्याय चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों और किसी अन्य परिवार को इस दर्द से न गुजरना पड़े।
Vedanta plant accident: आज भी राह देख रही हैं मासूम आंखें
Vedanta plant accident: जमगहन गांव में जब शाम होती है तो थंडाराम की बेटियां दरवाजे की ओर देखने लगती हैं। शायद उन्हें अब भी उम्मीद है कि उनके पापा एक दिन घर लौट आएंगे। लेकिन सच्चाई यह है कि वे कभी वापस नहीं आएंगे।
Vedanta plant accident: मां यशोदा हर बार बच्चों के सवालों का जवाब देने की कोशिश करती हैं, लेकिन उनकी आंखों से बहते आंसू सब कुछ बयां कर देते हैं। वेदांता प्लांट का यह हादसा केवल एक औद्योगिक दुर्घटना नहीं, बल्कि कई परिवारों के सपनों, उम्मीदों और खुशियों के टूट जाने की दर्दनाक कहानी बन गया है। आज भी उन मासूम बच्चों की आंखें अपने पिता की राह देख रही हैं, जिनका साया एक पल में उनसे छिन गया।
Vedanta plant accident: वेदांता प्लांट में हुए इस भीषण हादसे ने सिर्फ मजदूरों की जान नहीं ली, बल्कि कई परिवारों के सपनों और सहारे को भी छीन लिया। आज भी मासूम बच्चे अपने पिता के लौटने का इंतजार कर रहे हैं, जबकि परिजन हादसे के जिम्मेदार लोगों पर कड़ी कार्रवाई और न्याय की मांग कर रहे हैं। अब देखना होगा कि जांच में क्या सच सामने आता है और क्या पीड़ित परिवारों को केवल मुआवजा ही नहीं, बल्कि इंसाफ भी मिल पाता है या नहीं।









