Supreme Court : प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर SC का ऐतिहासिक निर्देश- गवर्नर के लिए नहीं तय की जा सकती समय सीमा

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नई दिल्ली: आज यानी गुरूवार 20 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की संविधान पीठ ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की ओर से भेजे गए 14 संवैधानिक सवालों पर अपनी राय जारी की। ये सवाल राज्यपाल और राष्ट्रपति के द्वारा विधेयकों पर कार्रवाई की समय-सीमा और शक्तियों से जुड़े थे।

जानकारी दें कि, यह संदर्भ उस फैसले के बाद आया था जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्यपाल और राष्ट्रपति को पारित बिलों पर तय अवधि में निर्णय लेना होगा। राष्ट्रपति ने इस पर संवैधानिक सीमाओं के उल्लंघन की चिंता जताई थी।

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पाँच जजों की पीठ का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर अपना फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया:

  • गवर्नर या राष्ट्रपति के लिए बिल मंजूरी की कोई समयसीमा तय नहीं की जा सकती।
  • डीम्ड असेंट का सिद्धांत संविधान की भावना और शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत के खिलाफ है।
  • अगर गवर्नर बिल पर मंजूरी नहीं दे रहे हैं, तो उसे ज़रूरी तौर पर विधानमंडल को वापस भेजना होगा।
  • इस बाबत CJI बी.आर. गवई ने कहा कि प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर यह फैसला एकमत से लिया गया है।

संघवाद और संविधान के तहत दिशानिर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि भारत के सहयोगी संघवाद में गवर्नर को बिल पर हाउस के साथ मतभेद दूर करने के लिए बातचीत करनी चाहिए, न कि रुकावट डालने वाली प्रक्रिया अपनानी चाहिए।

यदि राज्यपाल विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों को संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना रोकते हैं, तो यह संघवाद की भावना के खिलाफ होगा।

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राजनीतिक और संवैधानिक महत्व

यह निर्देश सभी राज्यों के लिए मार्गदर्शन है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि:

  • राज्यपाल और विधानसभा के बीच मतभेद संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीके से सुलझें।
  • राज्यपाल केवल बाधक नहीं, बल्कि संवाद और समझौते के माध्यम से बिलों को मंजूरी दिलाने में सक्रिय भूमिका निभाएं।
  • संघीय ढांचा और राज्यों के अधिकार मजबूत रहें।

गौरतलब है कि, सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक निर्णय राज्यपाल और राष्ट्रपति की शक्तियों की सीमाओं को स्पष्ट करता है। यह लोकतंत्र और संघीय ढांचे की मजबूती का संकेत है, जिससे राज्यों और केंद्र के बीच संतुलित और पारदर्शी संबंध कायम रहेंगे।

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