Annamalai Resigns: अन्नामलाई का अचानक इस्तीफा: दक्षिण भारत फतह करने के बीजेपी के ‘मिशन द्रविड़’ को लगा बड़ा झटका

Annamalai Resigns: नई दिल्ली/चेन्नई। तमिलनाडु की राजनीति में कुछ दिनों पहले तक भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के लिए किसी ‘रॉकस्टार’ माने जाने वाले प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलाई के अचानक आए इस्तीफे ने देश के सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। पूर्व आईपीएस अधिकारी, शानदार व्यक्तित्व और सत्ताधारी दल डीएमके (DMK) को जमीनी स्तर पर खुली चुनौती देने वाली आक्रामक शैली के कारण अन्नामलाई तमिलनाडु बीजेपी के अब तक के सबसे चर्चित चेहरे बन चुके थे। केंद्रीय नेतृत्व को पूरी उम्मीद थी कि उनके आक्रामक तेवरों के सहारे पार्टी पहली बार सच्चे मायनों में तमिल धरती पर अपनी वैचारिक जड़ें मजबूत कर पाएगी। परंतु, जून 2026 में अचानक आए उनके इस इस्तीफे और राष्ट्रीय महासचिव नितिन नबीन द्वारा इसे तुरंत स्वीकार किए जाने ने दक्षिण भारत में बीजेपी की पूरी चुनावी रणनीति पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।

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तमिलनाडु में बीजेपी की ताकत का इतिहास: शून्य से चार सीटों का सफर

यह पहली बार नहीं है जब बीजेपी ने तमिलनाडु में पैर जमाने के लिए इतनी बड़ी राजनीतिक ऊर्जा झोंकी हो। पार्टी और उसकी पूर्ववर्ती जनसंघ 1960 के दशक से ही राज्य में सक्रिय है, लेकिन उसे पहली वास्तविक सफलता 1990 के दशक के अंत में मिली।

  • सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन: वर्ष 1998 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने एआईएडीएमके (AIADMK) के साथ गठबंधन करके 3 सीटें और 1999 में 4 सीटें जीती थीं, जो अब तक का उसका सर्वश्रेष्ठ रिकॉर्ड है।

  • चुनावी गिरावट: इसके बाद गठबंधन टूटने से ग्राफ लगातार गिरता गया। वर्ष 2004, 2009 और यहाँ तक कि 2014 की प्रचंड मोदी लहर भी तमिलनाडु की दहलीज नहीं लांघ पाई और पार्टी महज 2 फीसदी से कम वोटों पर सिमट गई।

  • विधानसभा की स्थिति: वर्ष 2016 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 234 सीटों पर चुनाव लड़ा और एक भी सीट नहीं जीत पाई। 2021 में थोड़ा सुधार हुआ और उसने 4 सीटें जीतीं, लेकिन उसका कुल वोट शेयर महज 2.84 फीसदी ही रहा। मार्च 2024 के लोकसभा चुनाव में भी कड़ी मेहनत के बावजूद पार्टी अपना खाता खोलने में पूरी तरह नाकाम रही थी।

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तमिलनाडु के अलावा पूरे दक्षिण भारत में बीजेपी की मौजूदा स्थिति

1. केरल: द्विध्रुवीय राजनीति और जनसांख्यिकी की चुनौती

केरल की राजनीति परंपरागत रूप से कांग्रेस की अगुवाई वाले यूडीएफ (UDF) और वामदलों के एलडीएफ (LDF) के इर्द-गिर्द घूमती है। बीजेपी यहाँ तीसरी शक्ति बनने का प्रयास कर रही है। 2016 में पार्टी ने पहली बार एक विधानसभा सीट जीती, लेकिन 2021 में वह फिर शून्य पर आ गई। हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में अभिनेता-राजनेता सुरेश गोपी ने त्रिशूर सीट जीतकर इतिहास रचा, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता का नतीजा था, न कि संगठनात्मक मजबूती का। यहाँ मुस्लिम और ईसाई समुदाय की आबादी करीब 45 फीसदी है, जो हिंदुत्व के एजेंडे के लिए एक बड़ी सामाजिक चुनौती है।

2. कर्नाटक: दक्षिण का इकलौता गढ़ जहाँ बनाई सरकार

दक्षिण भारत की पूरी तस्वीर में कर्नाटक बीजेपी के लिए एक सफल अपवाद रहा है। वर्ष 2008 में बी.एस. येदियुरप्पा के नेतृत्व में पार्टी ने पहली बार यहाँ सरकार बनाई और इसके बाद 2018 व 2019 में भी सत्ता संभाली। कर्नाटक में बीजेपी की ताकत का मुख्य आधार मजबूत लिंगायत समुदाय और तटीय कर्नाटक में संघ का जमीनी ढांचा है। हालांकि, 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से मिली करारी हार के बाद और येदियुरप्पा के संन्यास लेने से पार्टी यहाँ एक बड़े और सर्वमान्य क्षेत्रीय चेहरे के संकट से जूझ रही है।

3. आंध्र प्रदेश: पूरी तरह क्षेत्रीय दलों के गठबंधन पर निर्भर

आंध्र प्रदेश हमेशा से क्षेत्रीय क्षत्रपों का गढ़ रहा है, जहाँ की राजनीति टीडीपी (TDP) और वाईएसआर कांग्रेस (YSR Congress) के बीच बंटी है। बीजेपी का अपना स्वतंत्र जनाधार यहाँ बेहद कमजोर है और वह केवल शहरी व्यापारी वर्ग तक सीमित है। 2024 के लोकसभा चुनाव में पवन कल्याण की जनसेना पार्टी और चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी के साथ त्रिकोणीय गठबंधन करने के कारण बीजेपी को 3 सीटों पर सफलता जरूर मिली, लेकिन यह जीत पूरी तरह से वैशाखियों (गठबंधन) पर टिकी हुई है।

4. तेलंगाना: उभरती हुई संभावना, पर दिल्ली अभी दूर है

तेलंगाना वह राज्य है जहाँ बीजेपी ने पिछले कुछ वर्षों में सबसे तेज राजनीतिक बढ़त दिखाई है। 2018 में महज 1 विधानसभा सीट जीतने वाली बीजेपी ने 2020 के हैदराबाद नगर निगम चुनाव में 48 सीटें जीतकर सबको चौंका दिया था। 2023 के विधानसभा चुनाव में भी पार्टी ने 8 सीटें जीतीं और अपना वोट शेयर बढ़ाकर 14 फीसदी कर लिया। इसके बावजूद, ग्रामीण क्षेत्रों में संगठन की कमी और बंदी संजय कुमार या किशन रेड्डी जैसे नेताओं के होने के बाद भी केसीआर (KCR) या रेवंत रेड्डी के कद का कोई ‘पैन-तेलंगाना’ चेहरा न होना इसकी बड़ी कमजोरी है।

हिंदुत्व की राजनीति के सामने क्यों खड़ी है द्रविड़ आंदोलन की मजबूत दीवार?

पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स के अनुसार, तमिलनाडु में हिंदुत्व के सामने एक पूरी वैचारिक और सांस्कृतिक दीवार खड़ी है, जिसे ‘द्रविड़ आंदोलन’ कहा जाता है। 20वीं सदी की शुरुआत में पेरियार ई.वी. रामास्वामी के नेतृत्व में शुरू हुए ‘आत्म-सम्मान आंदोलन’ ने उत्तर भारतीय सांस्कृतिक वर्चस्व, जाति और धार्मिक रूढ़ियों को कड़ा प्रतिरोध दिया था। इस आंदोलन ने तमिल अस्मिता को इस कदर स्थापित किया कि यहाँ का आम नागरिक मंदिर तो जाता है, लेकिन ‘हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान’ के राजनीतिक नारे को संदेह की नजर से देखता है। केरल और तमिलनाडु की यह लड़ाई राजनीतिक न होकर पूरी तरह सांस्कृतिक और ऐतिहासिक है, जहाँ स्थानीय अस्मिता और सामाजिक न्याय के मुद्दे हमेशा हावी रहते हैं।

विशेषज्ञों की राय: संगठनात्मक कमजोरी और चेहरों का भारी अकाल

राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी का कहना है कि दक्षिण में बीजेपी की असली कमजोरी वैचारिक प्रतिरोध के साथ-साथ जमीनी स्तर पर बूथ नेटवर्क का न होना और कद्दावर क्षेत्रीय चेहरों की कमी है। उत्तर भारत की तरह उनके पास नरेंद्र मोदी या योगी आदित्यनाथ जैसा कोई स्थानीय चेहरा नहीं है जिसकी स्वीकार्यता जातियों के बंधन को तोड़ सके।

वहीं, वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई का मानना है कि अन्नामलाई के जाने से तमिलनाडु में रफ्तार पर ब्रेक जरूर लगा है, लेकिन पूरे दक्षिण को ‘पंक्चर’ कहना जल्दबाजी होगी। आंध्र में पार्टी सत्ता में साझीदार है, तेलंगाना में ग्राफ बढ़ रहा है और केरल में पहली सीट आई है। लेकिन अगर बीजेपी ने हर दक्षिण भारतीय राज्य को उत्तर भारत के हूबहू राजनीतिक मॉडल पर जीतने की जिद नहीं छोड़ी, तो अन्नामलाई का इस्तीफा महज एक शुरुआत हो सकता है।

आगे की राह: अन्नामलाई के बाद अब कौन संभालेगा कमान?

अन्नामलाई के जाने के बाद तमिलनाडु बीजेपी में चेहरे का संकट गहरा गया है। वर्तमान में तेलंगाना की पूर्व राज्यपाल और तमिलनाडु बीजेपी की पूर्व अध्यक्ष डॉ. तमिलिसाई सुंदरराजन को एक अनुभवी और आक्रामक विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। इसके अलावा हिंदुत्व के मुखर नेता एच. राजा का नाम भी चर्चा में है, पर उनके विवादित बयानों के कारण केंद्रीय नेतृत्व किसी नए और युवा तमिल चेहरे पर भी दांव लगा सकता है। बीजेपी को यदि दक्षिण में लंबी रेस का घोड़ा बनना है, तो उसे ‘दिल्ली का एजेंडा’ थोपने के आरोप से बचकर स्थानीय मंदिर संस्कृति, संत परंपराओं और भाषाई गौरव को अपनाना होगा।

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