निशानेबाज न्यूज़ डेस्क: कई बार ऐसा देखा जाता है कि बच्चे बिना किसी स्पष्ट कारण के डर, चिंता या उदासी महसूस करते हैं। हाल ही में हुई कुछ वैज्ञानिक रिसर्च यह संकेत देती हैं कि इसके पीछे एक गहरा कारण हो सकता है—माता-पिता या पिछली पीढ़ियों के अनुभवों से जुड़ा मानसिक आघात। इसे विज्ञान की भाषा में इंटरजेनरेशनल ट्रॉमा (Intergenerational Trauma) कहा जाता है।
मनोविज्ञान और जेनेटिक्स के क्षेत्र में हुए अध्ययनों ने इस अवधारणा को नई दृष्टि दी है। शोधकर्ताओं के अनुसार बच्चे केवल वही नहीं सीखते जो वे देखते हैं, बल्कि कभी-कभी वे उन भावनात्मक घावों का असर भी महसूस कर सकते हैं जो उन्होंने स्वयं अनुभव नहीं किए होते।
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क्या कहता है विज्ञान
वैज्ञानिकों का मानना है कि जब कोई व्यक्ति गंभीर मानसिक आघात—जैसे युद्ध, अकाल, हिंसा, शोषण या गहरा शोक—से गुजरता है, तो उसका असर केवल मानसिक स्तर तक सीमित नहीं रहता। यह शरीर के जीन्स की कार्यप्रणाली पर भी प्रभाव डाल सकता है।
इस प्रक्रिया को एपीजेनेटिक्स (Epigenetics) कहा जाता है। इसमें डीएनए की मूल संरचना नहीं बदलती, लेकिन जीन्स के काम करने के तरीके पर रासायनिक “मार्क” बन जाते हैं। ये बदलाव कभी-कभी अगली पीढ़ी तक पहुंच सकते हैं, जिससे बच्चे तनाव या डर के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकते हैं।
बच्चों में कैसे दिखता है इसका असर
इंटरजेनरेशनल ट्रॉमा हर बच्चे में एक जैसा दिखाई दे, यह जरूरी नहीं है। फिर भी कुछ सामान्य संकेत देखे जा सकते हैं।
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बिना किसी स्पष्ट कारण के डर या चिंता महसूस करना
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हर समय सतर्क या असुरक्षित महसूस करना
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छोटी-छोटी बातों पर अत्यधिक गुस्सा या भावनात्मक प्रतिक्रिया
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सामाजिक रूप से अलग-थलग रहना
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तनाव या बीमारियों से लड़ने की क्षमता का कमजोर होना
परवरिश की भूमिका भी अहम
विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रॉमा केवल जीन्स के जरिए ही नहीं बल्कि व्यवहार और परवरिश के माध्यम से भी आगे बढ़ सकता है। यदि माता-पिता अपने पुराने डर या दुख से पूरी तरह उबर नहीं पाए हैं, तो उनका व्यवहार अनजाने में बच्चों को प्रभावित कर सकता है।
उदाहरण के तौर पर, एक अत्यधिक डरा हुआ माता-पिता अपने बच्चे के प्रति बहुत अधिक सुरक्षात्मक हो सकता है। इससे बच्चा दुनिया को असुरक्षित और खतरनाक जगह के रूप में देखने लगता है।
इस चक्र को कैसे तोड़ा जा सकता है
अच्छी बात यह है कि इंटरजेनरेशनल ट्रॉमा की इस श्रृंखला को तोड़ा जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार जागरूकता और सही कदम इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
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थेरेपी और काउंसलिंग: माता-पिता को अपने पुराने अनुभवों और भावनात्मक घावों पर विशेषज्ञों से खुलकर बात करनी चाहिए।
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सचेत परवरिश: बच्चों को सुरक्षित और प्रेमपूर्ण वातावरण देना जरूरी है।
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खुला संवाद: बच्चों से उनकी भावनाओं और डर के बारे में खुलकर बातचीत करना मददगार हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही विज्ञान यह संकेत देता हो कि ट्रॉमा पीढ़ियों तक पहुंच सकता है, लेकिन प्यार, समझ और सही मानसिक स्वास्थ्य सहायता इस प्रभाव को कम करने और एक स्वस्थ भविष्य बनाने में मदद कर सकती है।











