निशानेबाज न्यूज़ डेस्क : पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में रिकॉर्ड 92.88 फीसदी मतदान ने राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। यह आंकड़ा पिछले चुनाव के मुकाबले करीब 10 फीसदी ज्यादा है, जिससे साफ है कि इस बार जनता ने बढ़-चढ़कर लोकतंत्र के इस पर्व में हिस्सा लिया है।
रिकॉर्ड वोटिंग ने बढ़ाया सियासी तापमान
152 सीटों पर हुए मतदान में 1478 उम्मीदवारों की किस्मत ईवीएम में कैद हो गई है। आजादी के बाद पहली बार बंगाल में 90 फीसदी से ज्यादा मतदान दर्ज किया गया है। अगर यही रुझान दूसरे चरण में भी कायम रहता है, तो यह राज्य के इतिहास का सबसे बड़ा वोटिंग टर्नआउट साबित हो सकता है।
महिला वोटरों की निर्णायक भागीदारी
इस बार महिला वोटरों ने पुरुषों से ज्यादा उत्साह दिखाया है। महिला मतदान 92.69 फीसदी रहा, जबकि पुरुषों का आंकड़ा 90.92 फीसदी दर्ज किया गया। यह संकेत देता है कि महिला वोट इस चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
किसे मिलेगा बंपर वोटिंग का फायदा?
राजनीतिक विश्लेषकों के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह भारी मतदान किसके पक्ष में जाएगा। हिंदू बहुल और मुस्लिम बहुल दोनों इलाकों में जबरदस्त वोटिंग हुई है, जिससे यह साफ है कि वोटिंग किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं रही।
बीजेपी बनाम टीएमसी: सीधी टक्कर
बीजेपी को उम्मीद है कि हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण और घुसपैठ जैसे मुद्दे उसे फायदा देंगे। वहीं टीएमसी को भरोसा है कि महिला, अल्पसंख्यक और ग्रामीण वोटर एक बार फिर उसके साथ खड़े रहेंगे। गृहमंत्री अमित शाह ने रिकॉर्ड वोटिंग को बदलाव का संकेत बताते हुए बीजेपी की जीत का दावा किया है।
पिछले चुनावों के आंकड़े क्या कहते हैं?
2021 के चुनाव में इन 152 सीटों पर टीएमसी ने 92 सीटें जीती थीं, जबकि बीजेपी को 59 सीटें मिली थीं। हालांकि 2019 लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने यहां मजबूत प्रदर्शन किया था, जिससे यह क्षेत्र दोनों दलों के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम बन गया है।
बढ़ी वोटिंग के पीछे क्या वजह?
विशेषज्ञों के मुताबिक, वोटर लिस्ट रिवीजन, CAA-NRC जैसे मुद्दे और बीजेपी-टीएमसी के बीच सीधी टक्कर ने वोटरों को बूथ तक खींचा है। दोनों पार्टियों ने अपने कैडर को सक्रिय कर अधिकतम मतदान सुनिश्चित करने की कोशिश की।
क्या इतिहास खुद को दोहराएगा?
बंगाल का राजनीतिक इतिहास बताता है कि ज्यादा मतदान अक्सर बदलाव का संकेत होता है। 2011 में मामूली बढ़त ने 34 साल पुरानी लेफ्ट सरकार को उखाड़ फेंका था। ऐसे में इस बार 10 फीसदी ज्यादा वोटिंग सत्ता के समीकरण बदल सकती है।











