बिलासपुर : कोरिया जिले के सरभोका स्थित ज्योति मिशन स्कूल में 9 वर्षीय छात्रा से दुष्कर्म के मामले में हाईकोर्ट ने बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने निचली अदालत के दोषमुक्ति आदेश को त्रुटिपूर्ण करार देते हुए मुख्य आरोपी फादर जोसेफ धन्ना स्वामी को उम्रकैद की सजा सुनाई है।
ट्रायल कोर्ट के फैसले पर सख्त टिप्पणी
9 जनवरी 2017 को बैकुंठपुर की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने तीनों आरोपियों को बरी कर दिया था। राज्य सरकार ने इस निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता के सुसंगत बयानों और मेडिकल साक्ष्यों को तकनीकी आधार पर नजरअंदाज किया, जो न्याय सिद्धांतों के अनुरूप नहीं था।
घटना का विवरण और आरोप
मामला 9 सितंबर 2015 का है, जब चौथी कक्षा में पढ़ने वाली 9 वर्षीय छात्रा, जो स्कूल हॉस्टल में रहती थी, के साथ दुष्कर्म हुआ। पीड़िता के अनुसार, बाथरूम में नशीला पदार्थ छिड़का गया था, जिससे उसे चक्कर आने लगे। बाद में आरोपी ने उसके कमरे में वारदात को अंजाम दिया।सुबह शिकायत करने पर स्कूल की सिस्टर फिलोमिना और किसमरिया ने मदद करने के बजाय उसे डांटा और धमकाया।
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मेडिकल और एफएसएल रिपोर्ट से पुष्टि
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में डॉ. कलावती पटेल की मेडिकल रिपोर्ट का उल्लेख किया, जिसमें निजी अंगों पर गंभीर चोटों और सूजन की पुष्टि हुई थी। एफएसएल रिपोर्ट में पीड़िता के कपड़ों पर मानव शुक्राणु पाए गए, जिसने अभियोजन के पक्ष को मजबूत किया।कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बलात्कार पीड़िता की गवाही स्वयं में पर्याप्त साक्ष्य है और उसे किसी स्वतंत्र गवाह के समर्थन की अनिवार्यता नहीं है।
सजा का विवरण
मुख्य आरोपी फादर जोसेफ धन्ना स्वामी को आईपीसी की धारा 376(2) और पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद और 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई।वहीं, घटना को छिपाने और पीड़िता की मदद न करने के आरोप में फिलोमिना केरकेट्टा और किसमरिया को आईपीसी की धारा 119 के तहत 7-7 वर्ष की कठोर कारावास और 5-5 हजार रुपये जुर्माने की सजा दी गई।यह फैसला बाल सुरक्षा कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन और न्याय प्रणाली की जवाबदेही को रेखांकित करता है।











