UGC के नए नियमों पर घमासान! सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई, CJI ने दी सुनवाई की मंजूरी

निशानेबाज न्यूज़ डेस्क : विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा प्रस्तावित Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 को लेकर शुरू हुआ विवाद अब शिक्षा परिसरों से निकलकर प्रशासन, न्यायपालिका और राजनीति तक पहुंच चुका है। छात्र संगठनों और शिक्षकों के विरोध के बाद अब यह मुद्दा राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया है।

 UGC हेडक्वार्टर के बाहर प्रदर्शन की घोषणा

नए नियमों के विरोध में जनरल कैटेगरी के छात्रों ने 27 जनवरी को दिल्ली स्थित UGC मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन करने का ऐलान किया है। छात्रों का आरोप है कि ये नियम समानता के नाम पर एक नए प्रकार के भेदभाव को जन्म दे सकते हैं। हाल के दिनों में एक सिटी मजिस्ट्रेट और सत्तारूढ़ पार्टी के युवा नेता के इस्तीफे ने इस मुद्दे को और संवेदनशील बना दिया है।

 सुप्रीम कोर्ट में पहुंचे UGC नियम

UGC के नए इक्विटी रेगुलेशंस को चुनौती देने वाली याचिका पर अब सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए सहमति जता दी है। यह मामला राहुल देवन बनाम केंद्र सरकार के नाम से दायर किया गया है। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि नए नियम जनरल कैटेगरी के छात्रों के अधिकारों को प्रभावित कर सकते हैं।

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 CJI की टिप्पणी ने बढ़ाई उम्मीद

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, याचिका का उल्लेख चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच के समक्ष किया गया। CJI ने कहा कि अदालत इस मामले की संवेदनशीलता से अवगत है और तकनीकी खामियों को दूर कर याचिका को औपचारिक सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा।

आनंद रंगनाथन ने उठाए गंभीर सवाल

वैज्ञानिक और लेखक आनंद रंगनाथन ने UGC के इक्विटी नियमों की सार्वजनिक रूप से आलोचना की है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि सामान्य वर्ग को उन अपराधों की सजा दी जा रही है, जो उन्होंने किए ही नहीं। उन्होंने झूठी शिकायतों पर दंड के प्रावधान न होने को नियमों की सबसे बड़ी कमजोरी बताया।

UGC इक्विटी नियम 2026 की 10 प्रमुख बातें

UGC के अनुसार, इन नियमों का उद्देश्य कैंपस में जाति, धर्म, लिंग और जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव रोकना है। हर संस्थान में Equal Opportunity Centre, Equity Committee, स्वतंत्र Ombudsperson, नियमित रिपोर्टिंग और उल्लंघन पर कड़ी सजा का प्रावधान शामिल है।

अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं। यह फैसला न सिर्फ उच्च शिक्षा व्यवस्था बल्कि सामाजिक संतुलन की दिशा भी तय कर सकता है।

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