Farmers Protest: घरघोड़ा/रायगढ़। धरमजयगढ़ क्षेत्र के ग्राम कुर्मीभौंना, पोरडा और पोरडी में प्रस्तावित महत्वाकांक्षी कोल परियोजना को लेकर भू-अर्जन मुआवजे का विवाद अब एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बनता जा रहा है। परियोजना से प्रभावित होने वाले ग्रामीणों की गूंज अब सीधे सत्ता के शीर्ष तक पहुंच चुकी है। अपनी मांगों को लेकर भू-प्रभावित किसानों ने पहले प्रदेश के वित्त मंत्री, फिर राजस्व मंत्री और अब सीधे विधानसभा अध्यक्ष के सामने अपनी सामूहिक पीड़ा रखी है। ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन द्वारा वर्ष 2007 में तय की गई बेहद पुरानी मुआवजा दरों को आज वर्ष 2026 में भी जबरन लागू करने का प्रयास किया जा रहा है, जबकि वर्तमान में जमीन की कीमतें बाजार में कई गुना बढ़ चुकी हैं।
वर्तमान नीति बनाम बाजार का हकीकत मूल्य
ग्रामीणों द्वारा प्रस्तुत किए गए आंकड़ों के मुताबिक, वर्तमान में लागू पुरानी सरकारी नीति के तहत असिंचित भूमि के लिए 6 लाख रुपये, अर्धसिंचित भूमि के लिए 8 लाख रुपये और सिंचित भूमि के लिए अधिकतम 10 लाख रुपये प्रति एकड़ की दर से ही मुआवजा निर्धारित किया गया है। इसके विपरीत, क्षेत्र में जमीन का वास्तविक बाजार मूल्य इस समय 20 से 25 लाख रुपये प्रति एकड़ या उससे भी कहीं अधिक हो चुका है। ऐसे में किसानों का सीधा सवाल है कि क्या 19 साल पहले तय की गई इस मामूली रकम से आज के महंगाई के दौर में कोई भी विस्थापित परिवार अपनी नई जिंदगी और बच्चों का भविष्य सुरक्षित कर पाएगा?
राजस्व मंत्री ने कलेक्टर को किया फोन, कैबिनेट में जाएगा मामला
मामले की गंभीरता को देखते हुए छत्तीसगढ़ के राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा ने प्रभावित ग्रामीणों से ज्ञापन लेने के तुरंत बाद संबंधित जिले के कलेक्टर से फोन पर लंबी चर्चा की। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, कलेक्टर ने मंत्री को स्पष्ट किया है कि पूर्व में निर्धारित इन मुआवजा दरों में किसी भी प्रकार का बदलाव केवल राज्य सरकार के स्तर पर ही संभव है। इस पर राजस्व मंत्री ने सकारात्मक रुख अपनाते हुए संकेत दिए हैं कि विस्थापितों के हितों को ध्यान में रखते हुए इस संवेदनशील मामले को आगामी कैबिनेट बैठक के मुख्य एजेंडे में शामिल किया जा सकता है।
विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने दिखाई तत्परता
यह पूरा मामला उस समय और अधिक गर्मा गया जब तीनों गांवों के भू-प्रभावित ग्रामीणों के एक बड़े प्रतिनिधिमंडल ने छत्तीसगढ़ विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह से मुलाकात कर उन्हें मैदानी हकीकत से अवगत कराया। जब ग्रामीणों ने लिखित रूप में यह बताया कि वर्ष 2007 की दरों पर वर्ष 2026 में भुगतान करने की प्रशासनिक तैयारी की जा रही है, तो विधानसभा अध्यक्ष ने तत्काल गंभीरता दिखाई। उन्होंने इस विस्थापन को किसानों के साथ अन्याय मानते हुए मुख्यमंत्री के नाम कड़ा रीमार्क दर्ज किया और आवेदन को त्वरित कार्रवाई के लिए आगे अग्रेषित कर दिया।
हस्तलिखित नोट्स में झलका विस्थापितों का दर्द
ग्रामीणों द्वारा सौंपे गए हस्तलिखित आवेदन और नोट्स में “2007 की न्यूनतम राशि” तथा “6-8-10 लाख की दर” को लेकर विस्थापित होने वाले परिवारों के भविष्य की गहरी चिंताएं साफ झलक रही हैं। ग्रामीणों ने स्पष्ट रूप से चेतावनी दी है कि इस दर पर किसी भी सूरत में नया पुनर्वास संभव नहीं है। वर्तमान में इन तीनों गांवों के सैकड़ों परिवारों पर बेघर होने का खतरा मंडरा रहा है, क्योंकि कई इलाकों में शत-प्रतिशत भू-अधिग्रहण की स्थिति बन रही है। अब सभी की नजरें सरकार के आगामी फैसले पर टिकी हैं कि क्या 19 साल पुरानी नीति बदलेगी या किसानों का यह आंदोलन और उग्र रूप लेगा।









