Friday, September 11, 2026
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Nitin Gadkari Defamation Case: एआई डीपफेक और फर्जी विज्ञापनों पर नितिन गडकरी का बड़ा कानूनी एक्शन: बॉम्बे हाईकोर्ट ने मेटा, एक्स और गूगल के खिलाफ केस करने की दी मंजूरी

Nitin Gadkari Defamation Case: मुंबई/नई दिल्ली। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से तैयार डीपफेक वीडियो और फर्जी विज्ञापनों के जरिए मशहूर हस्तियों की छवि धूमिल करने और आम जनता को ठगने वाले गिरोहों के खिलाफ केंद्र सरकार के वरिष्ठ मंत्री नितिन गडकरी ने सीधा कानूनी मोर्चा खोल दिया है।

केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी को बॉम्बे हाई कोर्ट से सोशल मीडिया और डिजिटल टेक दिग्गज मेटा (Meta), एक्स (X – पूर्व में ट्विटर) और गूगल (Google) के खिलाफ सिविल मानहानि केस (Civil Defamation Suit) दायर करने की अनुमति मिल गई है।

हाई कोर्ट के जस्टिस अभय आहूजा ने गडकरी की याचिका पर सुनवाई करते हुए उन्हें केस दायर करने की परमिशन दी। ‘बार एंड बेंच’ की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत जल्द ही आपत्तिजनक कंटेंट को तुरंत हटाने और अस्थायी रोक लगाने जैसी अंतरिम राहत (Interim Relief) वाली याचिकाओं पर सुनवाई करेगी।

क्या है पूरा मामला? (E20 पेट्रोल विवाद और डीपफेक विज्ञापन)

यह पूरा विवाद एआई (AI) तकनीक से तैयार किए गए फर्जी विज्ञापनों और हेरफेर किए गए डिजिटल कंटेंट से जुड़ा है।

  1. फर्जी निवेश योजनाएं: इंटरनेट पर ऐसे कई एआई डीपफेक वीडियो और स्पॉन्सर्ड विज्ञापन चलाए जा रहे थे, जिनमें नितिन गडकरी का चेहरा, फर्जी वीडियो और उनकी आवाज का इस्तेमाल किया गया। इन विज्ञापनों में दावा किया गया कि गडकरी किसी विशेष ऑनलाइन इन्वेस्टमेंट प्लेटफॉर्म का समर्थन कर रहे हैं और उसमें पैसे लगाकर लोग कम समय में भारी मुनाफा कमा सकते हैं।

  2. E20 और इथेनॉल ब्लेंडिंग पर झूठे आरोप: याचिकाओं में आरोप लगाया गया कि कुछ भ्रामक कंटेंट में नितिन गडकरी और उनके परिवार को केंद्र सरकार के इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल (EBP) प्रोग्राम और E20 पहल से निजी तौर पर वित्तीय लाभ और मुनाफा कमाने वाला बताकर गलत तरीके से जोड़ा गया।

कोर्ट में गडकरी के वकील की मुख्य दलीलें

अदालत में नितिन गडकरी का पक्ष वरिष्ठ वकील संदीप एस. लड्डा ने रखा। कोर्ट में दाखिल याचिका के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया:

  • मंत्रालय की भूमिका: EBP प्रोग्राम और E20 पहल का संपूर्ण संचालन और नियंत्रण केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा किया जाता है। इस नीति में नितिन गडकरी या उनके मंत्रालय की कोई व्यक्तिगत या व्यावसायिक भूमिका नहीं है।

  • छवि का दुरुपयोग: गडकरी ने किसी भी प्रकार के निजी निवेश प्लेटफॉर्म का समर्थन नहीं किया है। उनकी पहचान और सार्वजनिक साख का गलत इस्तेमाल कर आम नागरिकों को वित्तीय धोखाधड़ी का शिकार बनाया जा रहा है।

मेटा, एक्स और गूगल पर ही केस क्यों?

सवाल यह उठता है कि जब वीडियो किसी और ने बनाए, तो केस सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर क्यों किया जा रहा है?

  • प्लेटफॉर्म्स का विशाल नेटवर्क: मेटा के पास फेसबुक, इंस्टाग्राम और थ्रेड्स हैं; गूगल के पास यूट्यूब और उसका विशाल एडवर्टाइजिंग नेटवर्क है; वहीं एक्स (X) पर भी विज्ञापनों की भरमार है।

  • समय पर कार्रवाई न करने का आरोप: याचिका में आरोप लगाया गया है कि शिकायतों के बावजूद ये डिजिटल प्लेटफॉर्म्स फर्जी विज्ञापनों और डीपफेक वीडियो को समय रहते हटाने में विफल रहे।

  • इंटरमीडियरी (मध्यस्थ) की जिम्मेदारी: हालांकि भारतीय कानून के तहत सोशल मीडिया कंपनियों को ‘सेफ हार्बर’ (सुरक्षित क्षेत्र) का दर्जा प्राप्त है, लेकिन यदि शिकायत मिलने के बाद भी वे आईटी नियमों के तहत आपत्तिजनक कंटेंट नहीं हटाती हैं, तो उनकी कानूनी जवाबदेही तय की जा सकती है। बॉम्बे हाई कोर्ट इसी पहलू पर सुनवाई करेगा।

अपराध साबित होने पर कितनी हो सकती है सजा?

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, डीपफेक और फर्जी विज्ञापनों के जरिए धोखाधड़ी करने वालों पर भारत में कठोर कानूनी प्रावधान लागू होते हैं:

  • भारतीय न्याय संहिता (BNS): धोखाधड़ी (Cheating), प्रतिरूपण (Impersonation – दूसरे का रूप धारण करना) और जालसाजी (Forgery) की धाराओं के तहत आरोपियों को कई वर्षों की जेल और भारी जुर्माना हो सकता है।

  • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act): कंप्यूटर संसाधनों के दुरुपयोग, पहचान की चोरी (Identity Theft) और इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से ठगी करने पर भी सख्त सजा का प्रावधान है।

  • कार्रवाई का दायरा: सबसे पहले उन लोगों पर शिकंजा कसेगा जिन्होंने यह फर्जी वीडियो बनाए और विज्ञापनों से पैसे कमाए। वहीं, कोर्ट के आदेश पर नियमों की अनदेखी करने वाले टेक प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ भी आवश्यक दंडात्मक आदेश जारी किए जा सकते हैं।

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