Gharghoda SDM Office: कुर्सी किसी की, नाम किसी का: घरघोड़ा में ऑनलाइन सूचना का अधिकार बना मज़ाक; पूर्व PIO रमेश मोर और रिषा ठाकुर के भरोसे चल रही डिजिटल व्यवस्था

Gharghoda SDM Office: गौरी शंकर गुप्ता/घरघोड़ा। यदि आपको लगता है कि भूतकाल में यात्रा कराने वाली ‘टाइम मशीन’ केवल हॉलीवुड की काल्पनिक फिल्मों या विज्ञान कथाओं तक ही सीमित है, तो आपको अपनी इस विधिक गलतफहमी को दूर करने के लिए तुरंत छत्तीसगढ़ के घरघोड़ा SDM कार्यालय के आधिकारिक ऑनलाइन सूचना का अधिकार (RTI) पोर्टल का रुख करना चाहिए। डिजिटल इंडिया के इस आधुनिक और कस्टमाइज्ड दौर में घरघोड़ा अनुविभागीय राजस्व प्रशासन ने एक ऐसा ‘अद्भुत व चमत्कारी पोर्टल’ विकसित कर लिया है, जहाँ समय की सुइयां आगे बढ़ने के बजाय मानो ठहर सी गई हैं। इस विधिक शासकीय पोर्टल की महिमा ऐसी है कि यहाँ वर्तमान में जो अधिकारी विधिक रूप से मुख्य कुर्सी पर बैठकर वेतन उठा रहे हैं, उनका डिजिटल पटल पर नाम-निशान तक दर्ज नहीं है, लेकिन जो अधिकारी इतिहास का हिस्सा बनकर स्थानांतरित हो चुके हैं, वे आज भी इस डिजिटल दुनिया में ‘अमर’ बनकर राज कर रहे हैं।

कुर्सी पर कोई और, पोर्टल पर कोई और; दो पूर्व जन सूचना अधिकारियों के भरोसे डिजिटल सिस्टम

घरघोड़ा के इस आरटीआई पोर्टल महाशय को ‘वर्तमान साहब’ के नाम से शायद इतनी विधिक चिढ़ है कि उन्होंने महीनों पहले जा चुके पूर्व जन सूचना अधिकारियों (PIO)— रमेश मोर और रिषा ठाकुर का नाम आज भी अपनी मुख्य स्क्रीन पर सहेज कर रखा हुआ है। इसे कहते हैं असली ‘रिमोट कंट्रोल’ प्रशासनिक व्यवस्था।

दफ्तर की जमीनी हकीकत यह है कि जब कोई जागरूक नागरिक या आवेदक अपनी विधिक अर्जी लेकर लोक सूचना अधिकारी के कक्ष में पहुंचता है, तो सामने कुर्सी पर कोई और नए साहब मुस्कुराते हुए मिलते हैं। परंतु, जब वही आवेदक विधिक रूप से ऑनलाइन आवेदन दर्ज करने के लिए सरकारी पोर्टल खोलता है, तो वहाँ भूतपूर्व अधिकारी रमेश जी और रिषा जी डिजिटल रूप से उसका स्वागत करते नजर आते हैं। इस प्रशासनिक लापरवाही के कारण जनता बेचारी इस विधिक असमंजस में है कि वे सूचना आखिर मांगें तो किससे मांगें? उन वर्तमान साहब से, जो भौतिक दफ्तर में तो उपस्थित हैं पर डिजिटल पोर्टल पर गायब हैं, या फिर उन पूर्व अधिकारियों से, जो पोर्टल पर तो महामहिम हैं पर वास्तव में दफ्तर से विदा हो चुके हैं।

‘मिस्टर इंडिया’ मोड और अनोखा फ्री-हिट सिस्टम: जनता की शामत

इस विधिक और आईटी (IT) विभाग की घोर सुस्ती को देखकर तो यही प्रतीत होता है कि घरघोड़ा SDM दफ्तर का सूचना प्रौद्योगिकी सेल किसी गहरे ध्यान या योग निद्रा में लीन है। उनके लिए किसी नए अधिकारी का आना या पुराने का जाना महज़ एक लौकिक घटना है, जिससे उनके इस पवित्र और अपरिवर्तनीय डिजिटल पोर्टल की सेहत पर कोई विधिक फर्क नहीं पड़ता। इस ‘अदृश्य’ प्रशासनिक व्यवस्था पर क्षेत्र के बुद्धिजीवियों ने कई तीखे व्यंग्य बाण छोड़े हैं:

  • ‘मिस्टर इंडिया’ मोड में वर्तमान साहब: वर्तमान अनुविभागीय दंडाधिकारी (SDM) साहब का नाम पोर्टल से ऐसे विधिक रूप से गायब है, जैसे किसी पुरानी फिल्म में अनिल कपूर लाल चश्मा हटाने के बाद पूरी दुनिया से ओझल हो जाते थे। ऐसा लगता है कि साहब ने खुद को आरटीआई के विधिक दायरे से ‘गोपनीय’ रखने का कोई नया शॉर्टकट ढूंढ लिया है।

  • सैलरी वर्तमान को, क्रेडिट पूर्व को?: जब विधिक जवाबदेही और नाम की बात आती है, तो पोर्टल आज भी पुराने स्थानांतरित अधिकारियों के प्रति अपनी अटूट वफादारी निभा रहा है। क्या वर्तमान साहब के डिजिटल हस्ताक्षर की विधिक कीमत इस सरकारी पोर्टल की नजर में शून्य हो चुकी है?

  • अनोखा ‘फ्री हिट’ सिस्टम: यदि कोई आवेदक अनजाने में पोर्टल पर दिख रहे पुराने नाम से आवेदन लगा देता है और समय पर जानकारी नहीं मिलती, तो वर्तमान तंत्र बड़ी आसानी से विधिक पल्ला झाड़ते हुए कह सकता है कि— “साहब, वह नाम तो पुराने वाले का था।” और पुराने वाले तो वैसे भी ट्रांसफर लेकर जा चुके हैं। यानी चित भी सरकारी तंत्र की, पट भी उनकी, और शामत सिर्फ चक्कर काटने वाली आम जनता की!

पासवर्ड भूल गए या आलस का पहाड़? अब विधिक सुधार का इंतजार

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा विधिक सवाल यह उठता है कि क्या घरघोड़ा SDM कार्यालय के कंप्यूटर ऑपरेटर और आईटी प्रभारी इस सरकारी पोर्टल का लॉगिन पासवर्ड ही भूल चुके हैं, या फिर पासवर्ड भी कोई पुराना बाबू अपने साथ ट्रांसफर ऑर्डर की तरह साथ ले गया है? या फिर “अगले महीने देख लेंगे” वाली फाइलों के नीचे इस महत्वपूर्ण डिजिटल सुधार की सुध को दबा दिया गया है।

बहरहाल, घरघोड़ा का यह आरटीआई पोर्टल वर्तमान में विधिक पारदर्शिता का नहीं, बल्कि ‘प्रशासनिक आलस और सुस्ती’ का एक उत्कृष्ट और कस्टमाइज्ड स्मारक बन चुका है। अब देखना यह है कि मीडिया में इस व्यंग्यात्मक विधिक खुलासे के बाद वर्तमान साहब का ‘डिजिटल राजतिलक’ पोर्टल पर समय रहते सुनिश्चित होता है, या फिर यह चमत्कारी पोर्टल इसी तरह आवेदकों को भूतकाल की सैर कराता रहेगा। फिलहाल, आवेदक हाथ में आरटीआई की अर्जी लिए, आसमान में आँखें गड़ाए ढूंढ रहे हैं कि— “ओह वर्तमान साहब! आप इंटरनेट पर कहाँ छिपे हैं?”

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