नई दिल्ली: दुनिया में शादी को लेकर अलग‑अलग संस्कार और रस्में देखने को मिलती हैं। कहीं दुल्हन को गहनों से सजाया जाता है तो कहीं मेहंदी और हल्दी जैसी रस्में निभाई जाती हैं। लेकिन चीन की गेलाओ जनजाति में शादी से पहले निभाई जाने वाली एक परंपरा दुनियाभर में चौंकाने वाली मानी जाती है। इस जनजाति में दुल्हन के आगे के एक या दो दांत जानबूझकर तोड़ दिए जाते हैं, जिसे विवाह से पहले जरूरी रस्म माना जाता है।
कौन हैं गेलाओ जनजाति के लोग
गेलाओ एक प्राचीन जातीय समुदाय है, जो मुख्य रूप से चीन के दक्षिणी हिस्से में स्थित गुइझोउ प्रांत में निवास करता है। इसके अलावा इस समुदाय के लोग वियतनाम के कुछ क्षेत्रों में भी पाए जाते हैं। वर्ष 2021 की जनगणना के अनुसार, चीन में गेलाओ समुदाय की आबादी करीब 6.77 लाख से अधिक थी। परंपरागत रूप से यह समुदाय खेती‑किसानी पर निर्भर रहा है।
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शादी से पहले क्यों तोड़े जाते हैं दांत
गेलाओ जनजाति में यह मान्यता रही है कि अगर दुल्हन के दांत नहीं तोड़े गए तो दूल्हे के परिवार पर संकट आ सकता है। इसे अपशकुन से जोड़कर देखा जाता था। इसलिए विवाह से पहले दांत तोड़ने की रस्म को अनिवार्य माना गया। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही थी और सामाजिक दबाव के चलते महिलाएं इसे निभाने को मजबूर होती थीं।
सदियों पुरानी लोककथा से जुड़ी परंपरा
इतिहासकारों के अनुसार, इस परंपरा का जिक्र दक्षिणी सोंग राजवंश (1127–1279) के समय से मिलता है। एक लोककथा के मुताबिक, एक गेलाओ युवती शादी से पहले फल तोड़ते समय चट्टान से गिर गई थी, जिससे उसके आगे के दांत टूट गए। उसकी बहादुरी और समर्पण को सम्मान देने के लिए समुदाय ने इसे परंपरा का रूप दे दिया।
हथौड़े से निकाले जाते थे दांत
इस रस्म के दौरान लड़की के मामा को विशेष सम्मान के साथ बुलाया जाता था। छोटे हथौड़े की मदद से आगे के दांत निकाले जाते थे। बाद में मसूड़ों पर औषधीय पाउडर लगाया जाता था ताकि संक्रमण न फैले। यदि मामा मौजूद न हों तो मां की ओर से कोई पुरुष रिश्तेदार यह रस्म निभाता था।
कुत्ते के दांत लगाने की भी थी प्रथा
कुछ मामलों में सौंदर्य बनाए रखने के लिए निकाले गए दांतों की जगह कुत्ते के दांत लगाए जाते थे। यह बात 1957 में गुइझोउ प्रांतीय जातीय अध्ययन संस्थान की रिपोर्ट में भी सामने आई थी।
अब धीरे‑धीरे खत्म हो रही है यह परंपरा
समय के साथ शिक्षा और आधुनिक सोच के प्रभाव से यह कठोर परंपरा लगभग समाप्त हो चुकी है। किंग राजवंश के अंतिम दौर के बाद यह रस्म धीरे‑धीरे खत्म होने लगी और आज केवल इतिहास और शोध पुस्तकों तक ही सीमित रह गई है।













