Chhattisgarh Sharab Ghotala : 10 महीने बाद कौन सी जांच बाकी?…कवासी लखमा केस में सुप्रीम कोर्ट ने ED को लगाई कड़ी फटकार…

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Chhattisgarh Sharab Ghotala
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 Chhattisgarh Sharab Ghotala : नई दिल्ली। छत्तीसगढ़ के कथित शराब घोटाला मामले में आरोपी पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने ED की धीमी जांच पर सवाल उठाते हुए पूछा कि जब एक ओर वह आरोपियों की जमानत का विरोध कर रही है, तो दूसरी ओर ऐसी कौन-सी जांच है जो अभी तक लंबित है।

 Chhattisgarh Sharab Ghotala : जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमल्या बागची की पीठ ने ED से स्पष्ट रूप से पूछा, “आप कहते हैं कि आरोपियों को बेल नहीं देनी है, और साथ ही कहते हैं कि हम जांच कर रहे हैं। तो ऐसी कौन-सी जांच है, जो 10 महीने से चल रही है और अभी तक पूरी नहीं हुई है?”

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जांच अधिकारी से पर्सनल एफिडेविट तलब

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कठोर रुख अपनाते हुए ED को आदेश दिया है कि जांच अधिकारी (IO) अपना व्यक्तिगत शपथ पत्र (Personal Affidavit) दाखिल करें। इस एफिडेविट में उन्हें स्पष्ट करना होगा कि पूर्व मंत्री कवासी लखमा के खिलाफ कौन-सी जांच अभी भी चल रही है और इस जांच को पूरा करने के लिए कितने समय की आवश्यकता है।

कवासी लखमा को ED ने 15 जनवरी 2025 को गिरफ्तार किया था और इसके बाद EOW ने भी उन्हें गिरफ्तार किया। वह बीते 10 महीने से जेल में बंद हैं। उनकी बिगड़ती तबीयत को देखते हुए कांग्रेस पार्टी ने भी उनके जल्द इलाज की मांग की है।

अधिकारियों की अंतरिम सुरक्षा स्थायी

इसी मामले से जुड़ी एक अन्य सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के आबकारी विभाग के उन अधिकारियों को राहत दी है, जिन्हें पहले अंतरिम गिरफ्तारी सुरक्षा प्रदान की गई थी। कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग और भ्रष्टाचार के आरोपों से जुड़े मामलों में इन अधिकारियों की अंतरिम सुरक्षा को स्थायी (Permanent) कर दिया है।

₹2,100 करोड़ के घोटाले का आरोप और गिरफ्तारी की वजह

ED का आरोप है कि छत्तीसगढ़ में तीन साल तक चले इस शराब घोटाले से सरकारी खजाने को भारी नुकसान हुआ, जबकि एक सिंडिकेट ने ₹2,100 करोड़ से अधिक की अवैध कमाई की।

सिंडिकेट का हिस्सा: ED का आरोप है कि पूर्व मंत्री कवासी लखमा इस सिंडिकेट के एक अहम हिस्सा थे और उनके निर्देशों पर ही यह अवैध नेटवर्क काम करता था।

नीति में भूमिका: लखमा पर शराब नीति बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने, उनके इशारे पर FL-10 लाइसेंस की शुरुआत करने, और आबकारी विभाग की गड़बड़ियों की जानकारी होने के बावजूद उसे न रोकने का आरोप है।

कमीशन की राशि: ED ने कोर्ट में बताया कि लखमा को इस दौरान हर महीने ₹2 करोड़ रुपए मिलते थे, जिससे 36 महीनों में उन्हें कुल ₹72 करोड़ रुपए मिले। इस राशि का उपयोग उनके बेटे के घर के निर्माण और कांग्रेस भवन सुकमा के निर्माण में किया गया।

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कैसे किया गया ₹2,000 करोड़ से अधिक का घोटाला?

ED के अनुसार, यह घोटाला तत्कालीन भूपेश सरकार के कार्यकाल में आईएएस अधिकारी अनिल टुटेजा, आबकारी विभाग के एमडी ए.पी. त्रिपाठी और कारोबारी अनवर ढेबर के सिंडिकेट द्वारा तीन मुख्य श्रेणियों (A, B, C) में बांटा गया था:

कमीशन (A): डिस्टलरी संचालकों से प्रति पेटी ₹75 से ₹100 तक कमीशन लिया गया। इसके एवज में नए टेंडर में शराब की कीमतें बढ़ाई गईं और ओवर बिलिंग की राहत दी गई।

नकली शराब की बिक्री (B): सिंडिकेट ने डिस्टलरी मालिकों से अधिक शराब बनवाकर नकली होलोग्राम लगाकर उसे सरकारी दुकानों से बिकवाया। इसके लिए डुप्लीकेट होलोग्राम सप्लायर (विधु गुप्ता) और खाली बोतल सप्लायर (अरविंद सिंह और अमित सिंह) का नेटवर्क तैयार किया गया।

आबकारी अधिकारियों और दुकान कर्मचारियों की मिलीभगत से ₹2,880 से ₹3,840 प्रति पेटी की दर से 40 लाख पेटी से अधिक नकली शराब बेची गई।

सप्लाई ज़ोन में हेरफेर (C): देशी शराब की सप्लाई के लिए डिस्टलरीज़ के एरिया को 8 ज़ोन में विभाजित किया गया। सिंडिकेट हर साल कमीशन के आधार पर ज़ोन का निर्धारण करने लगा और क्षेत्र को कम/ज्यादा करके डिस्टलरी से पैसा वसूलता था। तीन वित्तीय वर्षों में पार्ट C के तौर पर ₹52 करोड़ रुपए की अवैध उगाही की गई।

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