Chhattisgarh High Court RTE Case : बिलासपुर: छत्तीसगढ़ में शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन और नियमावली तैयार करने में हो रही देरी पर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के प्रति कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि यह मामला बच्चों के मौलिक अधिकारों से जुड़ा है, इसलिए इसमें प्रशासनिक शिथिलता स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव को पूरी प्रक्रिया की व्यक्तिगत रूप से निगरानी करने और जल्द से जल्द नियम लागू करने के निर्देश दिए हैं।
विधायी प्रक्रिया का हवाला: सुनवाई के दौरान शिक्षा सचिव ने व्यक्तिगत रूप से शपथपत्र पेश करते हुए बताया कि आरटीई अधिनियम की धारा 35(2) के तहत विस्तृत दिशा-निर्देश तैयार किए जा रहे हैं। उन्होंने तर्क दिया कि चूँकि यह एक विधायी प्रक्रिया है और इसमें कई विभागों के बीच समन्वय की आवश्यकता होती है, इसलिए इसमें समय लग रहा है। हालांकि, कोर्ट ने इस देरी पर असंतोष जताते हुए 11 मार्च को अगली सुनवाई की तारीख तय की है।
शिकायतों के निपटारे का दावा: सचिव ने अदालत को जिलेवार आंकड़ों की जानकारी देते हुए बताया कि दुर्ग में 183, रायपुर में 157 और बिलासपुर में 99 शिकायतों का निराकरण पोर्टल के माध्यम से किया जा चुका है। इसके विपरीत, याचिकाकर्ता सीवी भागवंत राव के अधिवक्ता देवार्षि ठाकुर ने दलील दी कि पोर्टल के अलावा व्यक्तिगत रूप से की गई सैकड़ों शिकायतें अभी भी लंबित हैं, जिन पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। इस पर कोर्ट ने सचिव को सभी लंबित आवेदनों पर त्वरित कार्रवाई के आदेश दिए।
मध्य सत्र में निष्कासन पर चिंता: सुनवाई में एक गंभीर हस्तक्षेप याचिका भी सामने आई, जिसमें आरोप लगाया गया कि कुछ निजी स्कूलों ने बिना दस्तावेज़ सत्यापन के बीच सत्र में ही बच्चों के प्रवेश रद्द कर दिए हैं। साथ ही स्कूलों में बच्चों के शोषण से जुड़े मामलों पर भी चिंता जताई गई। हाईकोर्ट ने हस्तक्षेपकर्ताओं को 10 दिनों के भीतर शिक्षा सचिव के समक्ष अपनी शिकायत दर्ज कराने का निर्देश दिया है, ताकि इन पर कानूनी संज्ञान लिया जा सके।













