रायपुर: रायपुर की पुरानी बस्ती थाना पुलिस ने शहर में आतंक फैलाने वाले कुख्यात सूदखोर तोमर परिवार के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए 2200 पन्नों की विस्तृत चार्जशीट अदालत में बीते सितंबर को ही दाखिल कर दी थी। 2,200 पन्नों वाली इस पहली चार्जशीट में साफ़ किया गया है कि सूदखोरी नेटवर्क के कई ताने-बाने शुभ्रा सिंह तोमर (41) और भावना तोमर (30) के हाथों में घूमते थे।
वहीं चार्जशीट के मुताबिक़ दोनों ने कर्ज़ देने-वसूली से जुड़ी कंपनी चलाई और भतीजे दिव्यांश सिंह (25) के माध्यम से जमीन पर दबाव बनाया गया। यह आरोप न सिर्फ़ गंभीर हैं बल्कि पारिवारिक नेतृत्व के रूप में “महिला-ऑपरेटर” की अनोखी तस्वीर भी बनाते हैं—जो पारंपरिक सूदखोरी केसों से अलग है।
कौन-सा सबूत चार्जशीट में दिखा
चार्जशीट में कथित वसूली, धमकी व जबरन कब्जे के मामलों का विस्तृत ब्यौरा दिया गया है। पर कार्यवाही की वैधता और पुलिस के संकलित सबूत — कॉल-डिटेल्स, बैंक ट्रांजैक्शन, गवाह बयानों और जब्त दस्तावेज — को सार्वजनिक करना जरूरी है ताकि आरोपों की पुष्टि हो सके।
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पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठते प्रश्न
चार्जशीट दाखिल होने के बावजूद रोहित लगभग छह महीने से फरार हैं। यह स्थिति तीन तरह के सवाल छोड़ती है:
- क्या लोकल संरक्षण/सहयोग (political/local patronage) की वजह से आरोपियों को पनाह मिल रही है?
- क्या पुलिस की खोज-तफ्ती में कानूनी या तकनीकी खामियाँ हैं?
- क्या पुलिस ने प्राथमिकता के आधार में दोषपूर्ण निर्णय लिए—जहाँ महिला आरोपियों पर जल्दी कार्रवाई हुई पर पुरुष प्रमुख आरोपियों को पकड़ने में नाकामी रही?
- स्थानीयों की टिप्पणी और दर्ज मुकदमों की संख्या इस बात का संकेत है कि नेटवर्क व्यापक और गहरा है — और केवल चार्जशीट भरना ही पर्याप्त नहीं।
- कठोर, पारदर्शी और काग़ज़ी जाँच की आवश्यकता
एक ठोस जांच के लिए निम्न कदम जरूरी हैं:
- चार्जशीट के पन्नों में उल्लिखित बैंक/लेन-देन रिकॉर्ड सार्वजनिक/कठोर ऑडिट के लिए मांगे जाएँ।
- कॉल-डिटेल्स और मोबाइल लोकेशन ट्रेस करके आरोपी-कनेक्शनों का मानचित्र बनाना चाहिए।
- जिन पुलिस टीमों ने प्रारंभिक छापे और गिरफ्तारी की—उनके ऑपरेशन लॉग व निर्णय-वजहें स्वतंत्र समीक्षा के दायरे में आएँ।
- RTI/विशेष जाँच टिप्पणियों से यह पता लगाया जाए कि क्या किसी तरह का लोकल संरक्षण रहा।
गंभीर अपराध और दर्ज 8 से अधिक केस
फरार रोहित और हिरासत में रहे वीरेंद्र पर हत्या, अपहरण, दुष्कर्म, ब्लैकमेलिंग और जबरन वसूली जैसे दर्जनों गंभीर अपराध दर्ज हैं। इनके खिलाफ पुरानी बस्ती, देवेंद्र नगर, तेलीबांधा सहित 8 से अधिक थानों में मुकदमे दर्ज हैं। इतने गंभीर मामलों के बावजूद आरोपी का फरार रहना पुलिस की नाकामी की ओर इशारा करता है।
बहुओं का ऑपरेशन और नेटवर्क
चार्जशीट में बताया गया है कि बहुएँ शुभ्रा और भावना सूदखोरी कंपनी का प्रबंधन करती थीं, जबकि भतीजा दिव्यांश घर-घर जाकर धमकियां देता और वसूली करता था। साथ ही बंटी सहारे और जीतेंद्र देवांगन घरों में हंगामा, सामान जब्त करने और दबाव बनाने की जिम्मेदारी संभालते थे।
- कानूनी कार्रवाई और पारदर्शिता की आवश्यकता
- चार्जशीट के दस्तावेज़ और बैंक ट्रांजैक्शन रिकॉर्ड की कठोर जाँच जरूरी है।
- पुलिस को रोहित और वीरेंद्र की फरारी के कारणों का स्वतंत्र ऑडिट करवाना चाहिए।
- इस मामले में लोकल समर्थन या संरक्षण की संभावना की जांच आवश्यक है।
तोमर गैंग का मामला सिर्फ़ क्रिमिनल चार्जशीट नहीं, बल्कि पुलिस की विश्वसनीयता और स्थानीय शासन पर टेस्ट केस बन गया है। जहाँ बहुओं की कथित अगुआई ने परंपरागत स्थिति उलट दी है, वहीं पुलिस की गिरती विश्वसनीयता पर उठ रहे सवाल यह अनिवार्य कर देते हैं कि प्रशासन न केवल आरोपियों को पकड़े बल्कि सार्वजनिक विश्वास लौटाने के लिए पूरी, पारदर्शी और समयबद्ध जांच भी कराए। बहुओं की सक्रिय भूमिका और फरार पुरुष आरोपियों की स्थिति दर्शाती है कि सिर्फ चार्जशीट भरना पर्याप्त नहीं। प्रशासन को पारदर्शी, समयबद्ध और कठोर कार्रवाई करके जनता का विश्वास बहाल करना होगा।











