Surajpur Paddy Scam 2026 : गौरी शंकर गुप्ता/सूरजपुर/रामानुजनगर: छत्तीसगढ़ में धान खरीदी का सीजन आते ही सहकारी समितियों में भ्रष्टाचार का खेल भी शुरू हो जाता है। ताजा मामला सूरजपुर जिले के रामानुजनगर विकासखंड की सहकारी समिति छिंदिया का है, जहाँ भौतिक सत्यापन के दौरान 3000 बोरी (करीब 1200 क्विंटल) धान कम पाया गया है। सरकारी दर पर इस गायब धान की कीमत लगभग 40 लाख रुपये है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि तहसीलदार की स्पष्ट रिपोर्ट के बावजूद अब तक प्रशासन की फाइलें टस से मस नहीं हुई हैं।
तहसीलदार की जांच में पुष्टि, फिर भी FIR से परहेज?
जनवरी में हुए औचक निरीक्षण के दौरान रामानुजनगर तहसीलदार ने खुद रजिस्टर में इस कमी को दर्ज किया था। नियमतः इतने बड़े गबन के मामले में तत्काल पुलिसिया कार्रवाई और एफआईआर होनी चाहिए थी, लेकिन हफ्तों बीत जाने के बाद भी जिम्मेदार अधिकारी केवल ‘जांच’ का रटा-रटाया जवाब दे रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि यह चुप्पी किसी बड़े संरक्षण की ओर इशारा करती है।
पिछली बार चपरासी हुआ सस्पेंड, इस बार कौन?
छिंदिया समिति में भ्रष्टाचार का इतिहास पुराना है। पिछले वर्ष ग्राम अर्जुनपुर के किसानों ने जब अनियमितता की शिकायत की थी, तब विभाग ने चालाकी दिखाते हुए एक चपरासी को निलंबित कर दिया और असली दोषियों (प्रबंधक व प्रभारियों) को क्लीन चिट दे दी। किसानों का सवाल है कि क्या एक चपरासी 40 लाख का धान अकेले डकार सकता है? इस बार फिर वही ‘खानापूर्ति वाली स्क्रिप्ट’ तैयार की जा रही है।
पूरे प्रदेश का यही ढर्रा: जांच की लीपापोती और कागजी कार्रवाई
यह सिर्फ सूरजपुर की कहानी नहीं है। छत्तीसगढ़ के लगभग हर जिले में धान खरीदी के बाद ‘शॉर्टेज’ (धान की कमी) का खेल होता है।
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बिचौलियों की एंट्री: समिति प्रबंधन बिचौलियों के साथ मिलकर कागजों पर धान की फर्जी एंट्री करता है।
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सूखत का बहाना: जब धान कम पड़ता है, तो उसे ‘सूखत’ या खराब मौसम की बलि चढ़ा दिया जाता है।
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छोटी मछलियों पर गाज: मामला मीडिया में उछला तो किसी कंप्यूटर ऑपरेटर या निचले कर्मचारी को बलि का बकरा बना दिया जाता है।
किसान आक्रोशित: आंदोलन की चेतावनी
छिंदिया और आसपास के ग्रामीणों में इस ‘सुनियोजित घोटाले’ को लेकर भारी आक्रोश है। उनका कहना है कि सहकारी समितियों को भ्रष्टाचार का अड्डा बना दिया गया है। यदि जल्द ही प्रबंधक और उच्चाधिकारियों पर एफआईआर दर्ज नहीं की गई, तो वे जिला मुख्यालय का घेराव करेंगे।
सरकारी खजाने की इस खुली लूट पर प्रशासन की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है। क्या मुख्यमंत्री के पारदर्शी शासन के दावों को जमीनी स्तर पर अफसरशाह और समिति प्रबंधक मिलकर ठेंगा दिखा रहे हैं? यह अब सुशासन के लिए एक बड़ी चुनौती है।











