Thursday, August 20, 2026
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Devshayani Ekadashi 2026: देवशयनी एकादशी इसी दिन से लगेगा चातुर्मास, 4 महीने के लिए योगनिद्रा में जाएंगे भगवान विष्णु

Devshayani Ekadashi 2026: रायपुर। सनातन धर्म में बेहद पूजनीय और महत्वपूर्ण मानी जाने वाली आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी इस साल 25 जुलाई 2026, दिन शनिवार को मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी पावन तिथि से ‘चातुर्मास’ का शुभारंभ हो जाता है और सृष्टि के पालनहार भगवान श्री हरि विष्णु अगले चार महीनों के लिए क्षीरसागर में योगनिद्रा (शयन अवस्था) में चले जाते हैं। भगवान विष्णु के शयन काल में जाने के कारण ही इसे देवशयनी, हरिशयनी, आषाढ़ी या पद्मा एकादशी भी कहा जाता है। इस अवधि में सभी प्रकार के शुभ और मांगलिक कार्यों पर पूरी तरह रोक लग जाती है। ज्योतिषियों के अनुसार, यदि आप भी विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, जनेऊ संस्कार या नया वाहन-मकान खरीदना चाहते हैं, तो 25 जुलाई से पहले ही इन कार्यों को संपन्न कर लें।

जानिए देवशयनी एकादशी का शुभ मुहूर्त और पारण का समय

पंचांग गणना के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 24 जुलाई 2026 को सुबह 09 बजकर 12 मिनट पर होगी, जो अगले दिन यानी 25 जुलाई 2026 को सुबह 11 बजकर 34 मिनट पर समाप्त होगी। सनातन धर्म में उदयातिथि की महत्ता के कारण एकादशी का मुख्य व्रत और त्योहार 25 जुलाई को ही रखा जाएगा। इस दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा के लिए शुभ मुहूर्त सुबह 07 बजकर 21 मिनट से सुबह 09 बजकर 03 मिनट तक रहेगा। वहीं, जो श्रद्धालु इस दिन व्रत रखेंगे, वे अगले दिन यानी 26 जुलाई 2026 को सुबह 05 बजकर 39 मिनट से लेकर सुबह 08 बजकर 22 मिनट के बीच (द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले) अपना व्रत पारण (खोल) सकेंगे।

क्यों खास है यह व्रत और क्या हैं इसके फल?

देवशयनी एकादशी का व्रत हिंदू धर्म में बहुत बड़ा और फलदायी माना गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस पवित्र दिन निष्ठापूर्वक व्रत रखने और भगवान विष्णु की आराधना करने से मनुष्य के जाने-अनजाने में किए गए सभी पापों का नाश होता है और उसके जीवन में आ रही तमाम बाधाएं व कष्ट दूर हो जाते हैं। यह व्रत न केवल सुख, समृद्धि और पारिवारिक शांति लेकर आता है, बल्कि इसके प्रभाव से व्यक्ति की अधूरी मनोकामनाएं भी पूरी हो जाती हैं और अंत में मोक्ष प्राप्ति का मार्ग सुलभ होता है। देवशयनी एकादशी से शुरू होकर यह शयन काल कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी) तक चलता है, जिसके बाद भगवान जागते हैं और मांगलिक कार्य पुनः शुरू होते हैं।

शास्त्रों के अनुसार ऐसे करें भगवान विष्णु की पूजा और व्रत

इस दिन व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को एक दिन पहले यानी दशमी की रात से ही सात्विक भोजन करना चाहिए और प्याज, लहसुन व तामसिक चीजों से पूरी तरह दूरी बना लेनी चाहिए। एकादशी के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान के बाद पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए, क्योंकि पीला रंग भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। इसके बाद हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प करें। पूजा स्थान पर श्री हरि की मूर्ति या चित्र स्थापित कर दीपक जलाएं। भगवान को जल, चंदन, पीले फूल, फल, धूप और पंचामृत अर्पित करें। इस पूजा में ‘तुलसी दल’ (तुलसी के पत्ते) का होना अनिवार्य है, क्योंकि तुलसी के बिना विष्णु जी भोग स्वीकार नहीं करते। पूजा के दौरान “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप या विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना अमोघ फल देता है। व्रत के अगले दिन (द्वादशी को) किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को अन्न-वस्त्र का दान देकर स्वयं सात्विक भोजन से व्रत खोलना चाहिए।

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