रायपुर: छत्तीसगढ़-आंध्र प्रदेश-महाराष्ट्र की त्रि-राज्य सीमा पर चल रहे बड़े ऑपरेशन में माओवादी मोर्चे को बड़ा झटका लगा है। शीर्ष कमांडर माड़वी हिडमा की मौत के बाद बचे हुए टॉप नक्सलियों में घबराहट है और सुरक्षा बलों ने उनका शिकंजा कस दिया है।
हिडमा की मौत: नक्सलियों को लगा सबसे बड़ा झटका
माड़वी हिडमा भारत में प्रतिबंधित माओवादी संगठन की सेंट्रल कमिटी का सदस्य था और आदिवासी इलाके से इस कमिटी में शामिल होने वाला सबसे युवा कमांडर था। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार हिडमा की मौत ने नक्सलियों की संगठनात्मक संरचना को हिला कर रख दिया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि हिडमा की मौत के बाद नक्सल संगठन के रसद नेटवर्क, जंगल क्षेत्र और स्थानीय समर्थन पर गंभीर असर पड़ा है। अब टॉप कमांडरों के लिए छिपना मुश्किल हो गया है।
नेतृत्व का संकट और संगठन में बंटवारा
विशेषज्ञ मानते हैं कि हिडमा के जाने के बाद माओवादी संगठन को करिश्माई और सशक्त नेतृत्व की कमी महसूस होगी। टॉप कमांडर अब संगठन को बनाए रखने और हमले संचालित करने के लिए ज्यादा मेहनत करेंगे।
- संगठन छोटे-छोटे समूहों में बंट सकता है
- निर्णय लेने में समय और संघर्ष बढ़ सकता है
- करिश्माई नेतृत्व की अनुपस्थिति से संगठन में असहमति बढ़ सकती है
सुरक्षा बलों के लिए सुनहरा अवसर
हिडमा की मौत ने सुरक्षा एजेंसियों को नक्सलियों पर दबाव बढ़ाने का अवसर दिया है।
- रसद और आपूर्ति लाइन काटी जा रही हैं
- जंगल नेटवर्क और सुरक्षित क्षेत्र सीमित हो रहे हैं
- बचे टॉप कमांडरों को आत्मसमर्पण का विकल्प दिया जा रहा है
सुरक्षा एजेंसियों की रणनीति
- रक्षा बलों ने रणनीति को तीन हिस्सों में बांटा है:
- टॉप नक्सली कमांडरों को उनके नेटवर्क से अलग करना
- रसद आपूर्ति को पूरी तरह काटना
- संगठन के जंगल-आधारित ढांचे को जड़ से नष्ट करना
इस रणनीति के तहत विशेष टीमें सीमावर्ती जिलों में लगातार अभियान चला रही हैं। एजेंसियों ने आत्मसमर्पण का मौका दिया है, लेकिन यदि नक्सली कमांडर इसे नहीं चुनते, तो उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी।
बचे हुए टॉप कमांडर
| कमांडर का नाम | भूमिका / पहचान | वर्तमान स्थिति |
|---|---|---|
| गणपति (मुप्पला लक्ष्मणा राव) | पूर्व महासचिव, संगठन के वैचारिक गुरु | सलाहकार भूमिका में सक्रिय |
| बापा राव | वरिष्ठ केंद्रीय कमेटी सदस्य | सक्रिय, ऑपरेशनल नेटवर्क का संचालन |
| देवा बरसे | ज़ोनल कमांडर | क्षेत्रीय ऑपरेशन और लॉजिस्टिक मूवमेंट की कमान |
| देव जी | वरिष्ठ कमांडर | सैन्य ढांचे और हमलों की योजना में सक्रिय |
| राम धेर माड़ | क्षेत्रीय कमांडर | दैनिक नक्सली मूवमेंट और रसद नेटवर्क में शामिल |
विशेषज्ञों का कहना है कि जंगल अब नक्सलियों के लिए सुरक्षित कवच नहीं रहा और आने वाले महीनों में उनके खिलाफ निर्णायक कार्रवाई संभव है।अब नक्सली कमांडरों के लिए छिपना कठिन होगा और आने वाले महीनों में निर्णायक कार्रवाई की संभावना है।
- स्थानीय समर्थन में गिरावट
- हिडमा के प्रभाव के कम होने से स्थानीय समर्थन भी कमजोर हुआ है।
- कुछ इलाके छोटे दलों में बंट सकते हैं
- लोग सुरक्षा एजेंसियों के दबाव के कारण नक्सलियों से दूरी बनाएंगे
- हमलों का स्वरूप अब छोटा, तेज और छिपकर होगा
विशेषज्ञों का कहना है कि जंगल अब नक्सलियों के लिए सुरक्षित कवच नहीं रहा, और आने वाले महीनों में उनके खिलाफ निर्णायक कार्रवाई की संभावना बढ़ गई है।
आगे का परिदृश्य
- संगठन में टूटाव और अस्थिरता बढ़ेगी
- बचे कमांडर छोटे-छोटे दलों में बंट सकते हैं
- हमलों का स्वरूप बदल सकता है – तेज, छोटे और छिपकर
- सुरक्षा एजेंसियों का दबाव लगातार बढ़ेगा
- स्थानीय समर्थन सिकुड़ने से आंदोलन कमजोर होगा
आगे क्या हो सकता है?
हिडमा के जाने के बाद नक्सलियों को करिश्माई नेतृत्व के अभाव में छोटे-छोटे समूहों में बंटना पड़ सकता है। फिलहाल लगभग 15 से अधिक एक्टिव लीडर बचे हैं, जिनमें से कुछ तीन दशक से सुरक्षा बलों के लिए चुनौती बने हुए हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि नक्सल संगठन अपनी टॉप लीडरशिप और आंदोलन को कैसे बचाता है।











