Thursday, September 24, 2026
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Social freedom : बांग्लादेश में तालिबानी ड्रेस कोड विवाद-महिलाओं के पहनावे पर प्रतिबंध, सोशल मीडिया पर मचा हंगामा

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Social freedom : नई दिल्ली। शेख हसीना सरकार के पतन के बाद सत्ता में आई मोहम्मद यूनुस की कट्टरपंथी सरकार ने बांग्लादेश को एक धार्मिक राष्ट्र बनाने की दिशा में कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। इसी क्रम में बांग्लादेश बैंक द्वारा जारी किए गए एक ड्रेस कोड आदेश ने पूरे देश में तूफान खड़ा कर दिया। आदेश के अनुसार, महिलाओं के शॉर्ट ड्रेस, स्लीवलेस टॉप और लेगिंग्स पहनने पर प्रतिबंध लगाया गया था। पुरुषों के लिए भी ड्रेस कोड तय किया गया, जिसमें जींस और फैंसी पायजामा पहनने की मनाही थी।

आदेश का सामाजिक प्रभाव :

सोशल मीडिया पर इस फैसले की जमकर आलोचना हुई। लोगों ने बैंक मैनेजमेंट से “पेशेवर और शालीन” पहनावे की परिभाषा पर सवाल उठाए। विरोध इतना बढ़ा कि बैंक को अपना आदेश वापस लेना पड़ा। फेसबुक और एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर हजारों लोगों ने इसे तालिबानी रवैया बताया।

सोशल मीडिया का प्रभाव :

एक यूजर ने लिखा, “बांग्लादेश बैंक ने इस्लामिक एजेंडे के तहत महिला अधिकारियों को शॉर्ट स्लीव और लेगिंग्स नहीं पहनने को कहा है, लेकिन बैंक गवर्नर की बेटी खुलेआम अपनी मर्जी का पहनावा चुन रही है।”

तुलना अफगान तालिबान से:

लोगों ने इस आदेश की तुलना तालिबान शासन से की, जहां महिलाओं को सिर से पांव तक कपड़े पहनने का आदेश होता है। सोशल मीडिया पर इसे एक “सतर्क तानाशाही” का उदय बताया गया।

महिला संगठनों की प्रतिक्रिया:

बांग्लादेश महिला परिषद की अध्यक्ष फ़ौजिया मुस्लिम ने कहा कि यह आदेश बांग्लादेश की बहुलतावादी संस्कृति के खिलाफ है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार एक खास सांस्कृतिक माहौल को गढ़ने की कोशिश कर रही है।

आधिकारिक प्रतिक्रिया:

बांग्लादेश बैंक के प्रवक्ता आरिफ़ हुसैन खान ने सफाई दी कि यह आदेश अनिवार्य नहीं बल्कि एक सलाह थी। हिजाब या बुर्का पहनने की कोई बाध्यता नहीं थी।

राजनीतिक संदर्भ:

विवादित ड्रेस कोड के साथ ही सरकार ने एक अध्यादेश भी पारित किया, जिसमें सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले कर्मचारियों पर कार्रवाई की बात कही गई, जिससे आम नागरिकों में और रोष फैल गया।

क्षेत्रीय कट्टरपंथ का बढ़ता प्रभाव:

बांग्लादेश में तालिबानी विचारधारा का प्रभाव बढ़ रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, यहां के युवा अब TTP और तालिबान की विचारधारा से प्रभावित हो रहे हैं। अफगानिस्तान में पाकिस्तानी तालिबान के साथ मारे गए एक सदस्य के पास से बांग्लादेशी नागरिकता के प्रमाण मिले हैं। इस पूरे विवाद ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बांग्लादेश में सामाजिक स्वतंत्रता को धार्मिक कट्टरता से चुनौती मिल रही है। हालांकि, सोशल मीडिया की सक्रियता और नागरिक समाज की सजगता के चलते फिलहाल इस विवादित आदेश को सरकार ने वापस ले लिया है। लेकिन, यह घटनाक्रम आने वाले समय में देश की राजनीतिक और सामाजिक दिशा को तय करने वाला हो सकता है।

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