नई दिल्ली: बुधवार को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले पहली बार 90 के स्तर को पार कर गया। शुरुआती कारोबार में यह 90.02 पर बंद हुआ। यह गिरावट मुख्य रूप से बैंकों की उच्च स्तर पर डॉलर खरीदारी और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की निकासी के कारण आई।
डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर क्यों हुआ?
फिनरेक्स ट्रेजरी एडवाइजर्स एलएलपी के ट्रेजरी हेड अनिल कुमार भंसाली के अनुसार, भारत सरकार और आरबीआई इंपोर्टर्स को मदद करने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे रुपया कमजोर हुआ। नेशनलाइज्ड बैंकों की लगातार डॉलर खरीद और भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता में अड़चनें भी गिरावट के प्रमुख कारण हैं।
Read More : Politics : राजनाथ सिंह का बड़ा बयान! बाबरी मस्जिद के लिए सरकारी धन देना चाहते थे नेहरू… बढ़ा राजनीतिक तापमान
आरबीआई और फेड की नीतियों पर नजर
भंसाली ने कहा कि अगर आरबीआई 90 पर सपोर्ट नहीं देता है तो रुपया 91 के स्तर तक गिर सकता है। एमपीसी की बैठक 5 दिसंबर को ब्याज दर पर फैसला करेगी, जबकि फेड की पॉलिसी रेट घोषणा 10 दिसंबर को होगी। ब्याज दर में कटौती से रुपया और कमजोर हो सकता है।
डॉलर इंडेक्स और कच्चे तेल का असर
छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले डॉलर सूचकांक 0.13% की गिरावट के साथ 99.22 पर था। वहीं, अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें 62.43 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई हैं।
Read More : Politics : राजनाथ सिंह का बड़ा बयान! बाबरी मस्जिद के लिए सरकारी धन देना चाहते थे नेहरू… बढ़ा राजनीतिक तापमान
घरेलू शेयर बाजार पर प्रभाव
डॉलर की मजबूती और एफआईआई की निकासी से घरेलू शेयर बाजार में भी गिरावट आई। शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स 165.35 अंक गिरकर 84,972.92 और निफ्टी 77.85 अंक घटकर 25,954.35 पर था। दिसंबर में विदेशी निवेशकों ने अब तक 4,335 करोड़ रुपये निकाल लिए हैं।
7 महीने में 8% की गिरावट
रुपया 2 मई को 83.76 पर था, जो 3 दिसंबर को 90.15 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया। इस अवधि में रुपए की कीमत में लगभग 6.39 रुपए की गिरावट हुई है, यानी करीब 8% का नुकसान।













