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C.G News : 17 साल पुराने रिश्वत मामले में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, ESIC के पूर्व मैनेजर बरी, जानें पूरा मामला


निशानेबाज न्यूज़ डेस्क :  करीब
17 साल पुराने रिश्वत मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए ईएसआईसी के तत्कालीन मैनेजर हेमेन्द्र वर्मा को बरी कर दिया है।

न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की एकलपीठ ने आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए रायपुर स्थित विशेष CBI न्यायालय द्वारा 2 दिसंबर 2005 को सुनाई गई सजा को रद्द कर दिया और आरोपी को संदेह का लाभ दिया।

क्या था पूरा मामला

जानकारी के अनुसार उस समय हेमेन्द्र वर्मा ESIC बिलासपुर में मैनेजर के पद पर कार्यरत थे। उनका दायित्व विभिन्न प्रतिष्ठानों में कर्मचारियों के लिए लागू ESI योजना के अनुपालन की जांच करना था।

अभियोजन पक्ष के मुताबिक जगमल चौक स्थित मनोज बेकरी के संचालक मनोज अग्रवाल से ESI अंशदान के कथित 60 हजार रुपये के बकाया को कम या खत्म करने के बदले 10 हजार रुपये रिश्वत मांगने का आरोप लगाया गया था।

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CBI ने 2001 में की थी ट्रैप कार्रवाई

शिकायत मिलने के बाद CBI की एंटी करप्शन ब्रांच (ACB) ने 16 अक्टूबर 2001 को ट्रैप कार्रवाई की थी। आरोप था कि बेकरी में पैसे लेने के बाद आरोपी को रंगे हाथ पकड़ा गया और उसके बैग से रिश्वत की राशि बरामद की गई।इसके बाद आरोपी के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर चार्जशीट पेश की गई थी।

ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी सजा

इस मामले में रायपुर स्थित CBI के विशेष न्यायालय ने वर्ष 2005 में आरोपी को दोषी ठहराते हुए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 और धारा 13(1)(डी) 13(2) के तहत एक-एक वर्ष के कठोर कारावास और 20-20 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।

हाईकोर्ट ने क्यों दिया संदेह का लाभ

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने गवाहों के बयान और दस्तावेजों का विस्तृत विश्लेषण किया। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष रिश्वत मांगने का स्पष्ट और भरोसेमंद प्रमाण पेश नहीं कर सका

शिकायतकर्ता ने अपने बयान में यह स्पष्ट नहीं कहा कि उसने आरोपी को रिश्वत के रूप में पैसे दिए थे। वहीं ट्रैप कार्रवाई में शामिल कई गवाहों ने भी रिश्वत मांगने की बात खुद सुनने से इनकार किया।

रिश्वत मांगने का प्रमाण जरूरी – कोर्ट

अदालत ने कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों में रिश्वत की मांग (डिमांड) साबित होना अनिवार्य शर्त हैकेवल पैसे की बरामदगी के आधार पर अपराध सिद्ध नहीं माना जा सकता।

इसी आधार पर अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष संदेह से परे अपराध साबित करने में असफल रहा, इसलिए आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी किया जाता है।

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