Aravalli mountain range : जयपुर/नई दिल्ली: उत्तर भारत की जीवनरेखा कही जाने वाली अरावली पर्वत श्रृंखला आज एक बार फिर सियासत और कानून के टकराव का केंद्र बन गई है। केंद्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल उस जवाब ने विवाद खड़ा कर दिया है, जिसमें कहा गया है कि केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को ही ‘अरावली’ माना जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह परिभाषा लागू हुई, तो अरावली की 80 से 90 प्रतिशत पहाड़ियां संरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएंगी, जिससे खनन माफियाओं के लिए रास्ते खुल जाएंगे।
क्या है ‘100 मीटर’ का विवाद? सरकार का तर्क है कि ऊंचाई को आधार बनाकर एक स्पष्ट वैज्ञानिक परिभाषा तय करना जरूरी है ताकि विकास और संरक्षण में संतुलन रहे। हालांकि, विपक्ष और पर्यावरणविदों का आरोप है कि यह परिभाषा अरावली के ‘गैपिंग एरिया’ और छोटी पहाड़ियों को तबाह कर देगी। ये वही पहाड़ियां हैं जो थार मरुस्थल की रेत को दिल्ली-हरियाणा तक पहुंचने से रोकती हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने चेतावनी दी है कि अरावली कमजोर हुई तो प्रदूषण और जल संकट का स्तर भयावह हो जाएगा।
कागजी हेरफेर और अल्टीमीटर का खेल: विवाद की एक गहरी परत भ्रष्टाचार से भी जुड़ी है। आरोप है कि कई जगहों पर 100 मीटर से ऊंची पहाड़ियों को अल्टीमीटर की मदद से कागजों पर 60-80 मीटर का दिखाकर खनन की अनुमति ले ली गई है। अलवर और सिरोही जैसे जिलों में ऐसे मामले सामने भी आए हैं। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) ने करीब 10 हजार पहाड़ियों पर खनन रोकने की सिफारिश की थी, जिसके खिलाफ राजस्थान सरकार कोर्ट गई। अब करीब 8 हजार जगहों पर फिर से खनन की अनुमति मिलने से पर्यावरण प्रेमी नाराज हैं।
सड़क पर उतरा जनआक्रोश: सोशल मीडिया पर #SaveAravalli अभियान तेजी से वायरल हो रहा है। कांग्रेस और उसके छात्र संगठन NSUI ने इसे उत्तर भारत के भविष्य का मुद्दा बनाते हुए 26 दिसंबर को जयपुर में ‘अरावली बचाओ पैदल मार्च’ निकालने का ऐलान किया है। विवाद अब केवल कानूनी नहीं रह गया है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए ‘सांस लेने लायक हवा’ और ‘पीने लायक पानी’ की जंग बन चुका है।













