Friday, August 21, 2026
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CG हाई कोर्ट का बड़ा फैसला! 28 सप्ताह की गर्भवती दुष्कर्म पीड़िता को गर्भपात की अनुमति

Rape Victim Abortion Permission: दुष्कर्म पीड़िता को गर्भपात की अनुमति मामले में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने 14 साल 6 माह की नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता को 28 सप्ताह से अधिक की गर्भावस्था होने के बावजूद चिकित्सकीय गर्भपात (एमटीपी) की अनुमति दे दी। कोर्ट ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद-21 प्रत्येक व्यक्ति को गरिमा, निजता और शारीरिक स्वायत्तता के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है। ऐसे मामलों में केवल कानून की समय सीमा के आधार पर राहत से इनकार नहीं किया जा सकता।

दुष्कर्म पीड़िता को गर्भपात की अनुमति से जुड़े मामले में याचिका के अनुसार दिसंबर 2025 में नाबालिग के साथ दुष्कर्म हुआ था। पीड़िता का कहना है कि आरोपी की धमकियों के कारण वह लंबे समय तक किसी को घटना की जानकारी नहीं दे सकी।जून 2026 में पेट दर्द की शिकायत होने पर परिजनों ने जांच कराई, तब पता चला कि वह गर्भवती है। इसके बाद परिवार ने आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज कराया।

अस्पताल ने कानून का हवाला देकर किया था इनकार
दुष्कर्म पीड़िता को गर्भपात की अनुमति की मांग लेकर परिजन अस्पताल पहुंचे थे। जांच में डॉक्टरों ने बताया कि गर्भ 28 सप्ताह से अधिक का हो चुका है। एमटीपी कानून के तहत सामान्य परिस्थितियों में 24 सप्ताह तक ही गर्भपात की अनुमति होती है। इसी कारण अस्पताल ने प्रक्रिया करने से इनकार कर दिया।इसके बाद पीड़िता के पिता ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और विशेष अनुमति की मांग की।
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मेडिकल बोर्ड ने कोर्ट को सौंपी रिपोर्ट
दुष्कर्म पीड़िता को गर्भपात की अनुमति पर फैसला लेने से पहले हाई कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड से रिपोर्ट मांगी। बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इस समय गर्भपात कराने पर अत्यधिक रक्तस्राव और संक्रमण का खतरा है।रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि यदि नाबालिग को गर्भ पूरा करने के लिए मजबूर किया जाता है तो उसके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर इससे भी अधिक गंभीर और लंबे समय तक असर पड़ सकता है। इसी रिपोर्ट को ध्यान में रखते हुए अदालत ने पीड़िता के हित में फैसला सुनाया।

अनुच्छेद-21 का दिया हवाला
दुष्कर्म पीड़िता को गर्भपात की अनुमति देते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि दुष्कर्म से ठहरा गर्भ किसी महिला या नाबालिग के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डालता है। अदालत के अनुसार किसी बच्ची को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भ पूरा करने के लिए मजबूर करना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा।कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गरिमा, निजता और शारीरिक स्वायत्तता संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत सुरक्षित अधिकार हैं और ऐसे मामलों में इन्हें सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

सरकार और स्वास्थ्य विभाग को दिए निर्देश
दुष्कर्म पीड़िता को गर्भपात की अनुमति संबंधी आदेश में हाई कोर्ट ने राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग को कई निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा कि पीड़िता को 10 जुलाई 2026 तक जिला अस्पताल या संबद्ध सरकारी मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया जाए।कोर्ट ने निर्देश दिया कि गर्भपात की पूरी प्रक्रिया दो स्त्री रोग विशेषज्ञों और एक सर्जन की निगरानी में कराई जाए। राजनांदगांव के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) पूरी प्रक्रिया की निगरानी करेंगे।

डीएनए साक्ष्य सुरक्षित रखने का आदेश
दुष्कर्म पीड़िता को गर्भपात की अनुमति वाले आदेश में अदालत ने भ्रूण के डीएनए और अन्य जरूरी नमूनों को सुरक्षित रखने के निर्देश भी दिए हैं। इन साक्ष्यों को जांच एजेंसी को सौंपा जाएगा ताकि आपराधिक मुकदमे के दौरान उनका उपयोग किया जा सके।साथ ही हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को दो सप्ताह के भीतर पूरी कार्रवाई की अनुपालन रिपोर्ट अदालत में पेश करने का भी निर्देश दिया है।

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