फरीदाबाद : फरीदाबाद से सटे अरावली पर्वत अब खामोश नहीं हैं। खनन, अवैध निर्माण और अंधाधुंध विकास की मार झेल रही अरावली की पहाड़ियां आज अपनी पीड़ा खुद बयां कर रही हैं। कभी जीवनदायिनी रही ये पहाड़ियां अब मानो रो रही हैं और इंसानियत से गुहार लगा रही हैं— “हमें बचा लो, वरना सब खत्म हो जाएगा।”
अरावली बचाओ, भविष्य बचाओ
“Save Aravali, Save Future”, “अरावली नहीं तो पानी नहीं”—ये नारे अब सिर्फ स्लोगन नहीं रहे, बल्कि करोड़ों लोगों और असंख्य वन्यजीवों की ज़िंदगी की पुकार बन चुके हैं। इस बाबत जब विभिन्न मीडिया चैनलों की टीम जब फरीदाबाद के कोट गांव पहुंची तो अरावली का असली महत्व जमीन पर साफ दिखा। अरावली से सटा यह गांव पूरी तरह पशुपालन पर निर्भर है। यहां हर ग्वाले के पास 50 से 80 गाय हैं और उनकी रोज़ी-रोटी अरावली की हरियाली से ही चलती है।
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अरावली ही हमारी रोज़ी-रोटी
कोट गांव के निवासी रोहतास बताते हैं कि खेती यहां लगभग न के बराबर है और पानी का कोई स्थायी साधन नहीं। उनके 60 से ज्यादा पशु अरावली की वनस्पतियों पर निर्भर हैं। गांव के लोग पेड़ कटने नहीं देते क्योंकि वे जानते हैं कि अरावली ही उनका जीवन है। इसी गांव के सुल्तान कहते हैं कि अरावली के बिना उनका अस्तित्व अधूरा है। अगर यहां तोड़-फोड़ हुई तो वे कहां जाएंगे—इसका कोई जवाब नहीं।
अरावली खत्म तो सब खत्म
स्थानीय निवासी गजराज बताते हैं कि अरावली सिर्फ इंसानों के लिए नहीं, बल्कि मोर, तीतर और कई दुर्लभ जीवों का भी घर है। अगर ये पहाड़ खत्म हुए तो इंसान और जानवर—दोनों पर संकट आ जाएगा।
पर्यावरण और विरासत की ढाल
पुरातत्व विशेषज्ञ तेजवीर मावी का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को गंभीरता से लागू करना जरूरी है। अरावली जल स्रोतों की रक्षा करती है, भूजल स्तर बनाए रखती है और प्रदूषण रोकती है। इसके अलावा यहां मानव सभ्यता से जुड़ी कई पुरातात्विक धरोहरें भी मौजूद हैं, जिन पर खतरा मंडरा रहा है।
अरावली सिर्फ पहाड़ नहीं, जीवन है
विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों की एक ही आवाज़ है—अरावली बचेगी तभी पानी, हवा, हरियाली और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित रहेगा। अब सवाल सिर्फ पर्यावरण का नहीं, बल्कि अस्तित्व का है।











