Vinod Kumar Shukla : रायपुर। आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रख्यात साहित्यकार, कवि और उपन्यासकार विनोद कुमार शुक्ल का मंगलवार शाम रायपुर के एम्स (AIIMS) अस्पताल में निधन हो गया। वे 88 वर्ष के थे। उनके बेटे शाश्वत शुक्ल ने जानकारी दी कि सांस लेने में तकलीफ के चलते उन्हें 2 दिसंबर को भर्ती कराया गया था। एम्स रायपुर के पीआरओ के मुताबिक, शाम 4:58 बजे मल्टी ऑर्गन इन्फेक्शन के कारण उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विनोद कुमार शुक्ल के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि हिंदी साहित्य जगत में शुक्ल जी का योगदान अमूल्य है और वे अपने लेखन के लिए हमेशा स्मरणीय रहेंगे। पीएम मोदी ने शोक संतप्त परिवार और उनके अनगिनत प्रशंसकों के प्रति अपनी संवेदनाएं व्यक्त की हैं। शुक्ल जी के परिवार में उनकी पत्नी, पुत्र शाश्वत और एक पुत्री हैं।
ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात लेखक विनोद कुमार शुक्ल जी के निधन से अत्यंत दुख हुआ है। हिन्दी साहित्य जगत में अपने अमूल्य योगदान के लिए वे हमेशा स्मरणीय रहेंगे। शोक की इस घड़ी में मेरी संवेदनाएं उनके परिजनों और प्रशंसकों के साथ हैं। ओम शांति।
— Narendra Modi (@narendramodi) December 23, 2025
Vinod Kumar Shukla : विनोद कुमार शुक्ल छत्तीसगढ़ से ज्ञानपीठ पुरस्कार (59वां) प्राप्त करने वाले पहले साहित्यकार थे। उनकी रचना प्रक्रिया बेहद सरल, भावनात्मक और जादुई यथार्थवाद से प्रेरित थी। 1971 में उनका पहला कविता संग्रह ‘लगभग जय हिंद’ प्रकाशित हुआ था, जिसने साहित्य प्रेमियों का ध्यान अपनी ओर खींचा। उनके प्रसिद्ध उपन्यासों में ‘नौकर की कमीज़’, ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ और ‘खिलेगा तो देखेंगे’ शामिल हैं, जो आम आदमी के रोजमर्रा के जीवन को एक नई दार्शनिक ऊंचाई देते हैं।
विनोद कुमार शुक्ल अपनी विशिष्ट लेखन शैली के लिए जाने जाते थे। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से दिखाया कि कैसे साधारण शब्दों में असाधारण संवेदनाएं पिरोई जा सकती हैं। हाल ही में ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने पर उन्होंने अपनी सहज मुस्कान के साथ कहा था, “पुरस्कार को मीठा नहीं कह सकता क्योंकि मैं मधुमेह का रोगी हूं।” लेखन के प्रति उनका समर्पण ऐसा था कि अंतिम समय तक वे अपनी अधूरी रचनाओं को पूरा करने की ललक रखते थे।
शुक्ल जी ने एक बार अपनी दुविधा साझा करते हुए कहा था कि उन्होंने जीवन में जितना महसूस किया और देखा, उसका बहुत कम हिस्सा ही वे कागज पर उतार पाए। उन्हें इस बात का अफसोस था कि जीवन के अंत की ओर बढ़ते हुए वे इतनी जल्दी कैसे लिख पाएंगे। उनका यह कथन उनके भीतर के उस रचनाकार को दर्शाता है जो कभी थका नहीं।
साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल का पार्थिव शरीर उनके रायपुर स्थित निवास स्थान पर ले जाया गया है, जहाँ अंतिम दर्शन के बाद उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। उनके जाने से न केवल छत्तीसगढ़, बल्कि संपूर्ण विश्व साहित्य ने एक ऐसी आवाज खो दी है जो सादगी में ही सुंदरता और सच्चाई की तलाश करती थी। उनकी कृतियां आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा मार्गदर्शक बनी रहेंगी।











