रायपुर : छत्तीसगढ़ में धान खरीदी अब और भी आसान होने वाली है। राज्य सरकार ने इस प्रक्रिया को सरल और किसान-अनुकूल बनाने की दिशा में एक अहम फैसला लिया है। इसके तहत तूहर टोकन ऐप को 24×7 उपलब्ध करा दिया गया है। यानी अब टोकन कटवाने के लिए किसी तय समय की बाध्यता नहीं होगी और किसान दिन-रात कभी भी टोकन बुक कर सकेंगे। सरकार का दावा है कि इससे किसानों को बड़ी सुविधा मिलेगी और धान विक्रय की प्रक्रिया सुगम होगी।
समय सीमा से राहत, योजना बनाने का मौका
राज्य सरकार के इस निर्णय के तहत किसान अब 13 जनवरी तक आगामी 20 दिनों के लिए टोकन प्राप्त कर सकेंगे। सरकार का कहना है कि इससे किसानों को धान बेचने की बेहतर योजना बनाने का अवसर मिलेगा और टोकन कटवाने के दौरान लगने वाली भीड़ व तकनीकी दबाव से राहत मिलेगी।
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छोटे किसानों के लिए विशेष घोषणा
इतना ही नहीं, सरकार ने 2 एकड़ और 2 एकड़ से कम रकबा वाले किसानों को अतिरिक्त राहत देते हुए 31 जनवरी तक तूहर टोकन ऐप से टोकन लेने की सुविधा दी है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के निर्देश पर यह फैसला लघु किसानों को ध्यान में रखकर लिया गया है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि टोकन प्रत्येक सहकारी समिति को आवंटित सीमा के भीतर ही जारी किए जाएंगे।
सरकार का पक्ष: किसान सर्वोच्च प्राथमिकता
मुख्यमंत्री साय ने कहा है कि किसानों की सुविधा और पारदर्शिता सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। तूहर टोकन ऐप को 24×7 खोलना और समय की बाध्यता समाप्त करना इसी सोच का परिणाम है। सरकार का दावा है कि इससे किसान बिना किसी दबाव के अपनी सुविधा अनुसार टोकन बुक कर सकेंगे और यह व्यवस्था किसानों को वास्तविक राहत देगी।
लेकिन सवाल दुर्ग से उठ रहे हैं…
24×7 ऐप, फिर भी दुर्ग में टोकन क्यों नहीं?
सरकार के इन दावों के बीच दुर्ग जिला जमीनी हकीकत की तस्वीर सामने ला रहा है। यहां किसान लगातार शिकायत कर रहे हैं कि जैसे ही वे तूहर टोकन ऐप खोलते हैं, कुछ ही मिनटों में पोर्टल “फुल” दिखने लगता है। सवाल उठता है कि अगर ऐप चौबीसों घंटे खुला है, तो यह इतनी जल्दी फुल कैसे हो जा रहा है?
ऑफलाइन व्यवस्था सिर्फ कागजों में?
सरकार के निर्देश के अनुसार 30 प्रतिशत टोकन ऑफलाइन सहकारी समितियों के जरिए जारी किए जाने हैं। लेकिन दुर्ग के कई किसानों का कहना है कि समितियों में भी उन्हें टोकन नहीं मिल पा रहा। कहीं “कोटा खत्म” बताया जा रहा है, तो कहीं टालमटोल।
सवाल यह है कि क्या ऑफलाइन टोकन व्यवस्था सिर्फ आदेशों तक सीमित है?
छोटे किसानों को राहत का दावा, अमल में क्यों नहीं?
2 एकड़ से कम जमीन वाले किसानों को 31 जनवरी तक टोकन की सुविधा देने की घोषणा हुई, लेकिन दुर्ग में कई लघु किसान अब भी समितियों और ऐप के चक्कर काट रहे हैं।
ऐसे में अगर नीति इतनी स्पष्ट है, तो लाभ धरातल तक क्यों नहीं पहुंच रहा?
प्रशासन का जवाब, लेकिन असमंजस बरकरार
दुर्ग कलेक्टर अभिजीत सिंह का कहना है कि 70 प्रतिशत टोकन ऑनलाइन और 30 प्रतिशत ऑफलाइन तय प्रक्रिया के तहत जारी किए जा रहे हैं और समितियों को पात्र किसानों को टोकन देने के निर्देश दिए गए हैं।
लेकिन किसान पूछ रहे हैं—
- अब अगर व्यवस्था सुचारु है, तो इतनी शिकायतें क्यों?
- अगर सिस्टम मजबूत है, तो हर दिन “पोर्टल फुल” क्यों?
नीति सकारात्मक, क्रियान्वयन सवालों के घेरे में
इसमें कोई शक नहीं कि सरकार की मंशा किसान-हितैषी दिखती है और फैसले कागजों पर सकारात्मक हैं। लेकिन दुर्ग जैसे जिलों की स्थिति यह सवाल खड़ा कर रही है कि क्या नीतियां जमीनी स्तर पर उतनी ही प्रभावी हैं?
धान खरीदी को सचमुच आसान बनाना है, तो सरकार को अब घोषणाओं से आगे बढ़कर सिस्टम की खामियों पर सख्ती से काम करना होगा, ताकि किसान राहत महसूस कर सकें, सिर्फ वादे नहीं।













