Supreme Court : सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यीय संविधान पीठ ने राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए राज्य विधानसभाओं से पारित विधेयकों पर फैसला लेने की समय-सीमा तय करने वाले अपने ही पिछले फैसले को पलट दिया है और इसे असंवैधानिक बताया है। यह निर्णय संविधान के आर्टिकल 143 के तहत राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा मांगे गए रेफरेंस के जवाब में आया है।
Supreme Court : राष्ट्रपति के रेफरेंस पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की 10 बड़ी बातें
भारत के चीफ जस्टिस (CJI) बीआर गवई की अगुवाई वाली संविधान पीठ ने इस संवेदनशील संवैधानिक मामले पर जो राय दी है, उसकी मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:
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समय-सीमा असंवैधानिक: सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि संवैधानिक अदालतें राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए विधेयकों पर निर्णय लेने की कोई समय-सीमा तय नहीं कर सकतीं। तमिलनाडु मामले में डबल बेंच द्वारा दिया गया ऐसा निर्देश असंवैधानिक था।
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संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत: अदालत संविधान के आर्टिकल 200/201 के तहत बिलों को मंजूरी देने के राष्ट्रपति और राज्यपाल के फैसलों के लिए कोई टाइमलाइन नहीं दे सकती।

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विवेकाधिकार सीमित नहीं: राज्यपाल के पास विधेयक को अपनी टिप्पणियों के साथ सदन को वापस भेजने या उसे राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रखने का विवेकाधिकार है, जिसे अदालत के माध्यम से सीमित नहीं किया जा सकता।
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‘डीम्ड असेंट’ का नजरिया गलत: कोर्ट द्वारा विधेयकों को ‘डीम्ड असेंट’ (मानित सहमति) के आधार पर मंजूरी मान लेने वाला दृष्टिकोण शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के विरुद्ध है, क्योंकि यह कार्यपालिका संबंधी कार्यों पर कब्ज़ा करना है।
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अनिश्चितकाल तक रोका नहीं जा सकता: राज्य विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों पर राज्यपाल अनिश्चितकाल तक सहमति को रोके नहीं रख सकते।
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संवाद का रास्ता अपनाएँ: भारत के सहकारी संघवाद में गवर्नरों को बिलों को लेकर विधायिका के साथ संवाद करनी चाहिए, अवरोध (obstructionist) वाला रवैया नहीं अपनाना चाहिए।
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सीमित न्यायिक दखल: अगर राज्यपालों की ओर से फैसला लेने में बहुत ही ज्यादा देर होती है या बिना वजह बताए इसे रोके रखा जाता है, तो अदालत न्यायिक समीक्षा के लिए सीमित दखल दे सकती है।

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फैसले का निर्देश: न्यायिक दखल के तहत, अदालत राज्यपाल को निर्देश दे सकती है कि वह एक निश्चित समय के अंदर उस पर फैसला लें, लेकिन कोर्ट विधेयक के गुण-दोष पर विचार नहीं करेगा।
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आर्टिकल 142 का उपयोग सीमित: सुप्रीम कोर्ट ने अप्रत्यक्ष रूप से यह भी संकेत दिया कि राज्यपाल के पास लंबित विधेयकों पर मंजूरी देने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 (पूर्ण न्याय करने की विशेष शक्ति) के तहत कोर्ट द्वारा विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करना उचित नहीं है।
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पिछले फैसले को पलटा: कोर्ट ने तमिलनाडु मामले में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की डबल बेंच के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें लंबित 10 बिलों को ‘डीम्ड असेंट’ मान लिया गया था और राज्यपाल/राष्ट्रपति के लिए समय सीमा तय की गई थी।









