Mahasamund School Lockout: पिथौरा (महासमुंद): छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के पिथौरा क्षेत्र से शिक्षा व्यवस्था की बदहाली को उजागर करने वाली एक बड़ी खबर सामने आई है। सरायपाली विकासखंड (ब्लॉक) के अंतर्गत आने वाले शासकीय जम्हारी हाईस्कूल के बच्चों ने स्कूल में लंबे समय से चल रही शिक्षकों की कमी से नाराज होकर स्कूल के मुख्य द्वार (मेन गेट) पर ताला जड़ दिया है। शुक्रवार (10 जुलाई 2026) की सुबह से ही छात्र-छात्राओं और उनके पालकों ने स्कूल परिसर के बाहर इकट्ठा होकर शिक्षा विभाग के खिलाफ जमकर मोर्चा खोल दिया और अपनी मांगों को लेकर नारेबाजी शुरू कर दी।
वर्षों से खाली पड़े हैं पद, अंधकार में बच्चों का भविष्य
स्थानीय ग्रामीणों और प्रदर्शनकारी छात्रों से मिली जानकारी के अनुसार, जम्हारी हाईस्कूल में पिछले कई वर्षों से अनेक महत्वपूर्ण विषयों के शिक्षकों के पद रिक्त पड़े हैं।
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पढ़ाई हो रही प्रभावित: नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत होने के बाद भी कई प्रमुख विषयों की कक्षाएं नहीं लग पा रही हैं, जिससे बच्चों की बोर्ड और सामान्य परीक्षाओं की तैयारी पर सीधा असर पड़ रहा है।
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विभाग की उदासीनता: ग्रामीणों का आरोप है कि इस संबंध में कई बार ध्यान आकर्षित कराने के बावजूद शिक्षा विभाग के आला अधिकारी शिक्षकों की स्थायी पदस्थापना को लेकर जरा भी गंभीर नजर नहीं आ रहे हैं।

“जब तक स्थायी व्यवस्था नहीं, तब तक नहीं खुलेगा ताला”
छात्रों और पालकों का सख्त रुख: शुक्रवार सुबह ठीक 10 बजे जैसे ही स्कूल का समय हुआ, छात्र-छात्राएं किताबों की जगह हाथों में तख्तियां लेकर गेट पर जमा हो गए। बच्चों और पालकों ने मिलकर स्कूल के मुख्य चैनल गेट पर ताला लगा दिया।
प्रदर्शन कर रहे छात्रों का साफ कहना है कि विभाग द्वारा अब तक उन्हें सिर्फ खोखले आश्वासन दिए गए हैं। इस बार वे किसी के झांसे में नहीं आएंगे। छात्रों ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी है कि जब तक स्कूल में सभी रिक्त पदों पर शिक्षकों की स्थायी व्यवस्था (पदस्थापना) नहीं हो जाती, तब तक स्कूल का ताला नहीं खोला जाएगा और यह विरोध प्रदर्शन अनवरत जारी रहेगा।
प्रशासनिक स्तर पर हलचल तेज
स्कूली बच्चों द्वारा की गई इस तालाबंदी और उग्र नारेबाजी की खबर मिलते ही स्थानीय प्रशासन और शिक्षा विभाग के अधिकारियों में हड़कंप मच गया है। खबर लिखे जाने तक बच्चे और उनके अभिभावक गेट के बाहर डटे हुए हैं। अब देखना होगा कि जिम्मेदार अधिकारी मौके पर पहुंचकर बच्चों को शांत कराने के लिए क्या ठोस कदम उठाते हैं या फिर ग्रामीण अंचल के इन बच्चों का भविष्य ऐसे ही अंधकार में लटका रहेगा।







