Rajesh Bhagat Aadhaar Lailunga : जांच का ‘झुनझुना’ और जनता की मजबूरी: तहसीलदार के आश्वासन के बीच सरेआम हो रही ग्रामीणों की लूट

Rajesh Bhagat Aadhaar Lailunga : लैलूंगा (गौरी शंकर गुप्ता): यदि आप नियम-कायदों के पक्के हैं, तो लैलूंगा की धरती आपकी इस ‘गलतफहमी’ को दूर करने के लिए काफी है। यहाँ शासन के आदेश केवल कागजों की शोभा बढ़ाते हैं, जबकि हकीकत निजी कमरों की बंद दीवारों के पीछे कुछ और ही गुल खिला रही है। लैलूंगा में ‘आधार’ कार्ड अब आम नागरिक की पहचान कम और संचालकों के लिए ‘अलादीन का चिराग’ ज्यादा साबित हो रहा है।

नियमों का ‘एनकाउंटर’: सरकारी छत से परहेज

शासन का स्पष्ट आदेश है कि आधार केंद्र केवल सरकारी भवनों में ही संचालित होंगे ताकि पारदर्शिता बनी रहे। लेकिन लैलूंगा के संचालकों को शायद सरकारी सीमेंट से ‘एलर्जी’ है। जिला प्रशासन के आदेशों को रद्दी की टोकरी में डालकर, ये केंद्र निजी ठिकानों पर इस ठाठ से चल रहे हैं जैसे कोई फाइव स्टार होटल हो। तर्क बड़ा गजब है—सरकारी भवन में पारदर्शिता का खतरा रहता है, और यहाँ तो खेल ही ‘अपारदर्शिता’ का है!

राजेश भगत एंड कंपनी: लूट का अनोखा ‘सॉफ्टवेयर’

लैलूंगा के मशहूर ‘आधार कलाकारों’ ने अर्थशास्त्र का एक नया नियम प्रतिपादित किया है, जिसे “मजबूरी टैक्स” कहा जा सकता है।

  • रेट का गणित: सरकारी रेट लिस्ट में जहाँ ₹75 लिखे हैं, वहां इन केंद्रों का सॉफ्टवेयर उसे ऑटोमेटिकली ₹150 कर देता है।

  • बहाना नंबर 1: “नया रेट लिस्ट अभी पैदल आ रहा है।” ग्रामीण बेचारे रसीद सरकारी रेट की थामते हैं और जेब ढीली ‘प्राइवेट रेट’ के हिसाब से करते हैं। इस अद्भुत हुनर के लिए तो संचालकों को ‘भ्रष्टाचार रत्न’ से नवाजा जाना चाहिए।

प्रशासन की ‘कछुआ चाल’ और जांच का जुमला

जब इस खुली लूट पर तहसीलदार शिवम पांडे साहब से सवाल किया जाता है, तो वही सदियों पुराना ‘मासूम’ जवाब मिलता है— “शिकायत मिली है, जांच करेंगे।” साहब! आदेश की धज्जियां महीनों से उड़ रही हैं, केंद्र सरेआम घरों में चल रहे हैं और प्रशासन अभी ‘जांच की फाइल’ में तेल डालने की तैयारी कर रहा है। शायद प्रशासन उस दिन का इंतजार कर रहा है जब संचालक खुद आकर आत्मसमर्पण कर दें।

कतार में खड़ा ‘त्रस्त’ ग्रामीण

सुबह 4 बजे से कतार में लगे उन बुजुर्गों और महिलाओं को देखिए, जो ‘डिजिटल इंडिया’ के इस शोषक अवतार को देख रहे हैं। धूप में पसीना बहाते ग्रामीणों के लिए आधार अब अधिकार नहीं, बल्कि एक ‘महंगा अत्याचार’ बन गया है। रसीद में कम पैसे और जेब से ज्यादा—यह जादू सिर्फ लैलूंगा के इन खास केंद्रों में ही मुमकिन है।

सावधान: अगर आप लैलूंगा में आधार सुधरवाने की सोच रहे हैं, तो जेब में सरकारी रेट नहीं, बल्कि ‘संचालक रेट’ लेकर जाएं, वरना सर्वर के साथ-साथ आपका नसीब भी ‘डाउन’ ही रहेगा!

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