नई दिल्ली। 2025 का नोबेल पुरस्कार फिजियोलॉजी या मेडिसिन में अमेरिका की मैरी ई. ब्रंकॉ, अमेरिका के फ्रेड रैम्सडेल और जापान के शिमोन साकागुची को दिया गया है। यह सम्मान उन्हें ‘पेरिफेरल इम्यून टॉलरेंस’ (शरीर के बाहरी हिस्सों में इम्यून सिस्टम की सहनशीलता) से जुड़ी उनकी खोजों के लिए दिया गया।
इस खोज ने शरीर की रक्षा प्रणाली को समझने में क्रांति ला दी है। इसके माध्यम से ऑटोइम्यून बीमारियों जैसे रूमेटॉइड आर्थराइटिस, टाइप-1 डायबिटीज और ल्यूपस के इलाज की संभावनाएं बढ़ी हैं। स्टॉकहोम के कारोलिंस्का इंस्टीट्यूट ने सोमवार को इस पुरस्कार की घोषणा की। नोबेल पुरस्कार की राशि 8.5 करोड़ रुपये है।
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इम्यून टॉलरेंस का मतलब है कि हमारा इम्यून सिस्टम किसी समय अपने ही अंगों पर हमला न करे। शरीर में कुछ समय तक इम्यून सेल्स प्राकृतिक रूप से ‘सहिष्णु’ बन जाती हैं, जिसे सेंट्रल इम्यून टॉलरेंस कहते हैं। मैरी ब्रंकॉ, फ्रेड रैम्सडेल और शिमोन साकागुची की खोज ने यह समझने में मदद की कि रेगुलेटरी टी-सेल्स (Tregs) और फॉक्सपी3 जीन शरीर की रक्षा प्रणाली को नियंत्रित करते हैं और ऑटोइम्यून बीमारियों के इलाज में मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।
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विशेषज्ञों का कहना है कि यह खोज कैंसर रिसर्च और ट्रांसप्लांट मेडिसिन में भी अहम बदलाव ला सकती है। Tregs और फॉक्सपी3 जीन को लक्षित कर नई दवाओं और थेरेपी विकसित करने की दिशा में शोध तेजी से बढ़ सकता है।
नोबेल पुरस्कार की इस घोषणा के साथ ही चिकित्सा जगत में एक बार फिर उम्मीदों और नई संभावनाओं की लहर दौड़ गई है, जिससे रोगों के इलाज में नए युग की शुरुआत हो सकती है।











