लेखक – विकास खलखो : Vande Mataram 150 Years Journey: देश के इतिहास में कुछ शब्द ऐसे होते हैं, जो समय की सीमाओं से परे चले जाते हैं। वे केवल उच्चारित नहीं होते, बल्कि पीढ़ियों की चेतना का हिस्सा बन जाते हैं। “वंदे मातरम्” ऐसा ही एक अमर उद्घोष है। यह केवल राष्ट्रगीत नहीं, बल्कि उस भावना का नाम है जिसने गुलामी के दौर में भारतीयों के मन में आत्मविश्वास जगाया और स्वतंत्रता की लड़ाई को जन-जन का आंदोलन बना दिया।
वर्ष 2026 में “वंदे मातरम्” अपनी रचना के 150 वर्ष पूरे कर रहा है। डेढ़ शताब्दी का यह सफर केवल एक गीत की यात्रा नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक अस्मिता और स्वतंत्रता संघर्ष की जीवंत गाथा है।
एक साहित्यकार की कलम से निकली अमर रचना
उन्नीसवीं शताब्दी का भारत राजनीतिक रूप से पराधीन था, लेकिन सांस्कृतिक रूप से जागरण के दौर से गुजर रहा था। इसी समय महान साहित्यकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने वर्ष 1876 में “वंदे मातरम्” की रचना की। कुछ वर्षों बाद इसे उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ में स्थान मिला और यहीं से यह गीत लाखों भारतीयों की जुबान पर चढ़ गया।
इस रचना में भारतभूमि को केवल एक भूभाग नहीं माना गया, बल्कि उसे जीवनदायिनी मां के रूप में देखा गया। खेतों की हरियाली, नदियों की निर्मलता, पर्वतों की भव्यता और प्रकृति की समृद्धि का ऐसा चित्रण किया गया कि पाठक और श्रोता स्वयं को उस मातृभूमि से गहराई से जुड़ा हुआ महसूस करने लगे।
जब “वंदे मातरम्” आंदोलन का नारा बन गया
इतिहास गवाह है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अनेक सभाओं, रैलियों और जनआंदोलनों की शुरुआत “वंदे मातरम्” के उद्घोष से होती थी। यह केवल गीत नहीं रहा, बल्कि अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस बन गया।
जब क्रांतिकारी फांसी के फंदे तक पहुंचे, जब सत्याग्रही जेलों में बंद हुए और जब हजारों नौजवान अंग्रेजी हुकूमत के सामने डटे रहे, तब उनके होंठों पर अक्सर यही दो शब्द होते थे— “वंदे मातरम्”।
अंग्रेजी सरकार भी इस गीत की शक्ति को समझ चुकी थी। कई स्थानों पर इसे सार्वजनिक रूप से गाने पर रोक लगाने की कोशिश हुई, लेकिन विचारों पर पहरा नहीं लगाया जा सकता। जितना इसे रोकने का प्रयास हुआ, उतनी ही इसकी गूंज दूर-दूर तक फैलती गई।
स्वतंत्र भारत में मिला सम्मान
आजादी के बाद संविधान सभा ने 24 जनवरी 1950 को “वंदे मातरम्” के पहले दो अंतरों को राष्ट्रीय गीत का दर्जा प्रदान किया। उसी दिन “जन गण मन” को राष्ट्रीय गान के रूप में स्वीकार किया गया।
यह निर्णय केवल संवैधानिक औपचारिकता नहीं था, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन में इस गीत के योगदान को राष्ट्रीय सम्मान देने का प्रतीक भी था। आज भी राष्ट्रीय समारोहों, शैक्षणिक संस्थानों और सांस्कृतिक आयोजनों में “वंदे मातरम्” पूरे सम्मान के साथ गाया जाता है।
150 वर्ष बाद भी क्यों उतना ही प्रासंगिक है यह गीत?
दुनिया बदल चुकी है। तकनीक ने जीवन की गति बढ़ा दी है, सोचने और संवाद करने के तरीके बदल गए हैं। लेकिन कुछ भावनाएं ऐसी होती हैं जो समय के साथ और अधिक गहरी होती जाती हैं। “वंदे मातरम्” उन्हीं भावनाओं में से एक है।
यह गीत हमें याद दिलाता है कि राष्ट्र केवल नक्शे पर बनी सीमाओं का नाम नहीं है। राष्ट्र उन लोगों का सामूहिक विश्वास है, जो विविधताओं के बावजूद एक साझा पहचान के साथ आगे बढ़ते हैं। यही कारण है कि डेढ़ सौ वर्ष बाद भी यह गीत भारतीयों के मन में वही सम्मान और अपनापन जगाता है।
नई पीढ़ी के लिए एक संदेश
आज की पीढ़ी स्वतंत्र भारत में जन्मी है। उसने गुलामी का दौर नहीं देखा, लेकिन स्वतंत्रता का मूल्य समझना उसके लिए उतना ही आवश्यक है। “वंदे मातरम्” केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य के लिए जिम्मेदारी का संदेश भी देता है।
देशभक्ति केवल सीमा पर हथियार उठाने तक सीमित नहीं है। अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करना, संविधान का सम्मान करना, सामाजिक सौहार्द बनाए रखना, पर्यावरण की रक्षा करना और समाज के प्रति जिम्मेदार नागरिक बनना भी राष्ट्रसेवा का ही स्वरूप है।
आज की जरूरत: भावना को जीवित रखना
आज जब सूचना का प्रवाह पहले से कहीं अधिक तेज है, तब इतिहास और संस्कृति को समझने की आवश्यकता भी उतनी ही बढ़ गई है। “वंदे मातरम्” के 150 वर्ष पूरे होना केवल एक स्मृति पर्व नहीं, बल्कि यह अवसर है कि हम नई पीढ़ी को उन मूल्यों से परिचित कराएं, जिनके आधार पर आधुनिक भारत का निर्माण हुआ।
डेढ़ सौ वर्षों की इस ऐतिहासिक यात्रा के बाद भी “वंदे मातरम्” की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। यह गीत हमें बार-बार याद दिलाता है कि राष्ट्रप्रेम केवल इतिहास का विषय नहीं, बल्कि वर्तमान की जिम्मेदारी और भविष्य का संकल्प भी है।
जब भी भारत अपनी स्वतंत्रता, संस्कृति और राष्ट्रीय एकता का स्मरण करेगा, “वंदे मातरम्” की गूंज उसी गर्व, उसी आत्मविश्वास और उसी श्रद्धा के साथ सुनाई देती रहेगी।
“वंदे मातरम्” केवल एक राष्ट्रगीत नहीं, बल्कि भारत की आत्मा की वह अनश्वर आवाज है, जो 150 वर्षों बाद भी हर भारतीय के हृदय में समान आदर, प्रेरणा और विश्वास के साथ धड़कती है।







