Administrative Apathy in Ambikapur: अम्बिकापुर: निजी स्कूलों की मनमानी के आगे बेबस हुआ शिक्षा विभाग, 4 बड़े स्कूलों पर 3 महीने बाद भी नहीं वसूला जा सका जुर्माना, अभिभावक परेशान

Administrative Apathy in Ambikapur: अम्बिकापुर / सरगुजा। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिला मुख्यालय अम्बिकापुर में निजी स्कूलों की मनमानी और शिक्षा विभाग की ढुलमुल कार्यप्रणाली एक बार फिर तीखे सवालों के घेरे में है। अप्रैल 2026 के महीने में जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग की संयुक्त टीम ने शहर के नामी स्कूलों में औचक निरीक्षण और अभिभावकों के साथ बैठकें की थीं। इस दौरान नियमों के गंभीर उल्लंघन और अभिभावकों पर महंगे निजी प्रकाशकों (प्राइवेट पब्लिकेशंस) की किताबें खरीदने का अघोषित दबाव बनाने की पुष्टि हुई थी।

इस बड़ी धांधली पर तत्समय जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) ने त्वरित एक्शन लेते हुए कई प्रतिष्ठित स्कूलों पर भारी-भरकम जुर्माना (Fine) लगाया था। जनता ने इस कड़े कदम की जमकर तारीफ भी की थी, लेकिन तीन महीने बीत जाने के बाद भी विभाग इस जुर्माने की राशि वसूलने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है।

इन 4 प्रमुख स्कूलों पर लगा था जुर्माना

प्रशासनिक जांच और अभिभावकों की लिखित शिकायतों के आधार पर जिन प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों पर नियमों के उल्लंघन के लिए जुर्माना ठोंका गया था, उनमें शामिल हैं:

  1. ओरिएंटल पब्लिक स्कूल (Oriental Public School)
  2. कार्मेल स्कूल (Carmel School)
  3. बिरला ओपन माइंड स्कूल (Birla Open Minds School)
  4. मोंटफोर्ट स्कूल (Montfort School)

अम्बिकापुर स्कूल विवाद: विसंगतियां और वर्तमान प्रशासनिक स्थिति

विषय / समस्या पूर्व की स्थिति और विभागीय दावे वर्तमान जमीनी हकीकत (जुलाई 2026)
जुर्माने की कार्रवाई अप्रैल 2026 में नियमों के उल्लंघन पर 04 बड़े स्कूलों पर जुर्माना लगाया गया। 03 महीने बाद भी शिक्षा विभाग ₹1 की भी रिकवरी (वसूली) नहीं कर पाया।
पुस्तकों की दोहरी मार विभाग के निर्देश के बाद अब अभिभावक दोबारा पैसे खर्च कर NCERT की किताबें खरीद रहे हैं। स्कूल प्रबंधन पुरानी प्राइवेट प्रकाशकों की महंगी किताबें वापस लेने या रिफंड करने से मुकर गए हैं।
प्रशासनिक ढील / तर्क डीईओ दिनेश झा का कहना है कि स्कूलों की ‘अभिभावक समिति’ ने प्राइवेट किताबों पर सहमति दे दी है। समाजसेवियों का आरोप है कि इन कमेटियों में गिने-चुने लोग हैं जिन पर स्कूल संचालकों का भारी दबाव है।

अभिभावकों पर पड़ी दोहरी आर्थिक मार, प्रशासन मौन

इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा नुकसान आम अभिभावकों को उठाना पड़ रहा है। अप्रैल में सत्र शुरू होते ही स्कूलों के दबाव में अभिभावकों ने हजारों रुपये खर्च कर निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें खरीद ली थीं। बाद में जब शिक्षा विभाग ने कड़ा रुख अपनाया और स्कूलों को एनसीईआरटी (NCERT) की किताबें लागू करने का निर्देश दिया, तो अभिभावकों ने दोबारा पैसे खर्च कर एनसीईआरटी की पुस्तकें खरीदीं।

अब दिक्कत यह है कि स्कूल प्रबंधन पहले बेची गई प्राइवेट किताबों को वापस लेने और उनका पैसा रिफंड करने से साफ इनकार कर रहा है। अभिभावकों का सीधा आरोप है कि यदि जिला प्रशासन समय पर सख्त हस्तक्षेप करता और किताबें वापस करने का आदेश जारी करता, तो उन्हें यह दोहरा आर्थिक नुकसान नहीं झेलना पड़ता।

डीईओ दिनेश झा का अजीब तर्क: ‘अभिभावक समिति’ को बनाया ढाल

जुर्माना वसूली न होने और कार्रवाई ठंडे बस्ते में जाने के सवाल पर जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) दिनेश झा ने सरकारी प्रक्रिया और विधिक पेच का हवाला दिया है। विभागीय अधिकारियों का तर्क है कि संबंधित स्कूलों में संचालित ‘अभिभावक समिति’ ने लिखित में विभाग को सौंप दिया है कि उन्हें प्राइवेट पब्लिकेशंस की किताबों से पढ़ाई कराने में कोई आपत्ति या परेशानी नहीं है।

हालांकि, इस तर्क पर पलटवार करते हुए स्थानीय अभिभावकों और जानी-मानी समाजसेवी शिल्पा पांडे ने गहरी नाराजगी जताई है। शिल्पा पांडे का कहना है कि इन तथाकथित समितियों में स्कूल प्रबंधन के कुछ गिने-चुने और चहेते अभिभावक ही शामिल होते हैं। स्कूल संचालकों द्वारा इन सदस्यों पर अघोषित रूप से दबाव बनाया जाता है और आम अभिभावकों की आवाज को दबा दिया जाता है। उन्होंने कलेक्टर से इस मामले की उच्च स्तरीय जांच और दोषी स्कूलों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की मांग की है।

अभिभावक महासंघ का आक्रोश:

“शुरुआत में भारी-भरकम जुर्माना लगाकर विभाग ने मीडिया में खूब वाहवाही लूटी, लेकिन आज तीन महीने बाद स्थिति जस की तस है। ऐसा प्रतीत होता है कि स्कूलों के बड़े सिंडिकेट और राजनीतिक दबाव के आगे जिला प्रशासन के अधिकारी पूरी तरह झुक गए हैं और परोक्ष रूप से इन मनमानी करने वाले स्कूलों को क्लीनचिट दे दी गई है।”

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