Dussehra 2025 : छत्तीसगढ़ का अजूबा दशहरा, रावण दहन नहीं, सहस्त्रबाहु वध, पढ़े अनोखी परंपरा…

Dussehra 2025 : धमतरी, छत्तीसगढ़। पूरे देश में जहाँ दशहरे पर रावण दहन कर असत्य पर सत्य की जीत का पर्व मनाया जाता है, वहीं धमतरी जिले का सिहावा अपनी सदियों पुरानी और अनोखी परंपरा के कारण देशभर में अलग पहचान रखता है। ओडिशा की सीमा से सटे इस ग्रामीण इलाके में रावण का नहीं, बल्कि सहस्त्रबाहु का वध किया जाता है।

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Dussehra 2025 : महिलाओं के लिए वर्जित, एकादशी पर वध

यह परंपरा कई विशिष्टताओं के कारण अद्वितीय है:

  • नग्न पुतला: वध के लिए सहस्त्रबाहु का मिट्टी से निर्मित नग्न पुतला बनाया जाता है।
  • वर्जित दर्शन: स्थानीय मान्यताओं और परंपरा के अनुसार, इस नग्न पुतले को महिलाओं का देखना पूरी तरह वर्जित है।
  • विलंब से उत्सव: आश्चर्यजनक रूप से, सहस्त्रबाहु का वध दशमी को नहीं, बल्कि उसके अगले दिन यानी एकादशी को किया जाता है।

श्रृंगी ऋषि, सप्त ऋषियों के आश्रम और महानदी के उद्गम स्थल के रूप में पहचाने जाने वाले सिहावा की इस परंपरा को देखने हर साल हजारों की संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं।

पौराणिक कथा: सीता माता के क्रोध का परिणाम

जानकार इस अनूठी प्रथा के पीछे एक पौराणिक कहानी का हवाला देते हैं:कथा के अनुसार, जब भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण का वध कर दिया, तब सीता माता ने उन्हें बताया कि युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ है और उन्हें सहस्त्रबाहु का भी वध करना है। ब्रह्मा से वरदान प्राप्त होने के कारण श्रीराम सहस्त्रबाहु का वध करने में सफल नहीं हो पाए। तब सहस्त्रबाहु ने मर्यादा भंग करते हुए सीता माता के सामने अपने वस्त्र खोल दिए। इस अपमान से क्रोधित होकर सीता माता ने कालिका का रूप धारण किया और अपने खड्ग से उसका वध किया। इसी घटना के सम्मान में, सिहावा के शीतला मंदिर का पुजारी माता के खड्ग से नग्न सहस्त्रबाहु का वध करता है।

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पुलिस की बंदूक से ‘हर्ष फायरिंग’

सिहावा के दशहरा उत्सव में प्रशासन की भी अहम भूमिका होती है:

  • जब शीतला मंदिर से पुजारी खड्ग लेकर पूरे गांव का भ्रमण शुरू करते हैं, तो उनके साथ भारी संख्या में ग्रामीण भी चलते हैं।
  • यह जुलूस सबसे पहले सिहावा थाने पहुंचता है।
  • यहां पुलिस बल अपनी बंदूक से ‘चांदमारी’ (हर्ष फायरिंग) करता है।
  • इसके बाद ही पुजारी आगे बढ़ते हैं और नग्न सहस्त्रबाहु का वध करते हैं।

यह अनोखी परंपरा आस्था, पौराणिक कथा और स्थानीय प्रशासन की भागीदारी का एक अद्भुत संगम है, जो सिहावा के दशहरा उत्सव को देश के बाकी हिस्सों से अलग बनाता है।

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