Sunday, September 27, 2026
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CG News: कौन थे हनुमान सिंह? छत्तीसगढ़ के इस मंगल पांडे ने तलवार से हिला दी थी अंग्रेजी हुकूमत की नींव

Nishaanebaz News Desk-Raipur Hanuman Singh: रायपुर के हनुमान सिंह की कहानी छत्तीसगढ़ के इतिहास में अंग्रेजी शासन के खिलाफ हुए एक बड़े सैन्य विद्रोह से जुड़ी है। 1857 की क्रांति के बाद देश के कई हिस्सों में अंग्रेजों के खिलाफ गुस्सा बढ़ रहा था। इसी माहौल में जनवरी 1858 में रायपुर की सैन्य छावनी में भी विद्रोह की घटना सामने आई।इतिहास से जुड़े रिकॉर्ड के मुताबिक, उस समय रायपुर में तैनात सैनिक हनुमान सिंह ने अंग्रेज अधिकारी सार्जेंट मेजर सिडवेल के खिलाफ हमला किया। इसके बाद छावनी में ऐसा संघर्ष हुआ, जिसने कई घंटों तक ब्रिटिश अधिकारियों को परेशान कर दिया।

रायपुर के हनुमान सिंह से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण घटना 18 जनवरी 1858 की बताई जाती है। रायपुर के पुलिस परेड ग्राउंड से जुड़ी इस घटना में हनुमान सिंह और उनके साथियों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ हथियार उठाए।बताया जाता है कि हनुमान सिंह ने सार्जेंट मेजर सिडवेल पर हमला किया और उनकी हत्या कर दी। इसके बाद उन्होंने अपने साथियों के साथ सैन्य छावनी में विद्रोह किया। अंग्रेज अधिकारियों को जैसे ही इसकी जानकारी मिली, उन्होंने विद्रोह को दबाने के लिए सैनिकों को सक्रिय किया।

छह घंटे तक अंग्रेजों से भिड़ते रहे
रायपुर के हनुमान सिंह की बहादुरी का उल्लेख इस घटना से जुड़े पुराने ब्रिटिश रिकॉर्ड में मिलता है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, विद्रोह को तुरंत काबू में नहीं किया जा सका और करीब छह घंटे तक संघर्ष की स्थिति बनी रही।हनुमान सिंह के साथ करीब 17 अन्य सैनिक भी थे। उन्होंने अंग्रेज अधिकारियों और उनके साथ मौजूद सैनिकों का विरोध किया। बाद में ब्रिटिश सैनिकों ने कार्रवाई कर विद्रोह को दबा दिया।इस घटना ने उस समय रायपुर में ब्रिटिश प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी थी।
स्कूल की किताब में हनुमान सिंह को बताया गया है मंगल पांडे की तरह। - Dainik Bhaskar17 साथियों को मिली फांसी की सजा
रायपुर के हनुमान सिंह के साथ विद्रोह में शामिल 17 सैनिकों को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया। बाद में उन्हें फांसी की सजा दी गई। ऐतिहासिक विवरणों में उनके नाम गाजी खान, अब्दुल हयात, मल्लू, शिवनारायण, पन्नालाल, मतादीन, ठाकुर सिंह, बली दुबे, लल्ला सिंह, बुद्धू सिंह, परमानंद, शोभाराम, दुर्गा प्रसाद, नजर मोहम्मद, देवीदान और जय गोविंद समेत अन्य साथियों के रूप में मिलते हैं।22 जनवरी 1858 को इन क्रांतिकारी सैनिकों को फांसी दिए जाने का उल्लेख इतिहास में मिलता है। लेकिन हनुमान सिंह अंग्रेजों की गिरफ्त में नहीं आए।
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फिर कहां गायब हो गए हनुमान सिंह?
रायपुर के हनुमान सिंह की कहानी का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि विद्रोह के बाद उनका क्या हुआ। ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें पकड़ने के लिए तलाश शुरू की थी। उनके खिलाफ वारंट जारी किया गया और अलग-अलग सैन्य टुकड़ियों को उनकी जानकारी भेजी गई।18 जनवरी 1858 की रात के बाद हनुमान सिंह के बारे में कोई पुख्ता जानकारी नहीं मिलती। इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के अनुसार, संभव है कि वह पहचान बदलकर या किसी सुरक्षित स्थान पर छिपकर अंग्रेजों की गिरफ्त से बाहर रहे हों। हालांकि उनके बाद के जीवन को लेकर कोई निश्चित प्रमाण सामने नहीं आया है।

अंग्रेजों के रिकॉर्ड में दर्ज था हुलिया
रायपुर के हनुमान सिंह को पकड़ने के लिए ब्रिटिश अधिकारियों ने उनके हुलिए की जानकारी भी दर्ज की थी। उपलब्ध वारंट के विवरण में उनकी लंबाई करीब 5 फीट 4 इंच, मजबूत शरीर, गोल चेहरा, बड़ी आंखें और ऊंचा माथा बताया गया था।रिकॉर्ड में उनकी मूंछों और तेज चाल का भी जिक्र मिलता है। उनके दाहिने हाथ की कलाई में लोहे का सुनहरे रंग का कड़ा होने की बात भी दर्ज थी। उन्हें बांसवाड़ा, राजस्थान का निवासी बताया गया था।इन जानकारियों के बावजूद ब्रिटिश सरकार उन्हें पकड़ नहीं सकी।
रायपुर के आशीष सिंह की डिजिटल आर्काइव में मौजूद अंग्रेजों के वारंट का विवरण। - Dainik Bhaskarछत्तीसगढ़ के मंगल पांडे के रूप में पहचान
रायपुर के हनुमान सिंह को कई जगहों पर छत्तीसगढ़ के मंगल पांडे के रूप में याद किया जाता है। इसकी वजह यह है कि दोनों की पहचान अंग्रेजी शासन के खिलाफ सैन्य विद्रोह से जुड़ी है।छत्तीसगढ़ में प्रतियोगी परीक्षाओं और स्थानीय इतिहास की किताबों में भी रायपुर के सैन्य विद्रोह और हनुमान सिंह का उल्लेख मिलता है। स्कूल स्तर की सामाजिक विज्ञान की किताबों में भी उन्हें छत्तीसगढ़ के मंगल पांडे के रूप में बताया गया है।

हनुमान सिंह की तस्वीर कैसी दिखती थी, यह भी बना रहस्य
रायपुर के हनुमान सिंह की वास्तविक तस्वीर उपलब्ध नहीं होने के कारण लंबे समय तक यह भी सवाल बना रहा कि वह दिखते कैसे थे। उनके पुराने ब्रिटिश रिकॉर्ड में दर्ज हुलिए के आधार पर एक कलाकार ने उनका संभावित रूप तैयार किया।इस तस्वीर को ऐतिहासिक प्रमाण के रूप में नहीं, बल्कि उपलब्ध रिकॉर्ड में दिए गए शारीरिक विवरण के आधार पर तैयार किए गए अनुमानित रूप के तौर पर देखा जाना चाहिए।

इतिहास में आज भी अनसुलझा है आखिरी अध्याय
रायपुर के हनुमान सिंह की कहानी का आखिरी अध्याय आज भी रहस्य बना हुआ है। अंग्रेजों ने उन्हें खोजने की कोशिश की, उनके खिलाफ इनाम घोषित किया और देश के अलग-अलग हिस्सों में तलाश की गई, लेकिन उनका कोई निश्चित सुराग नहीं मिला।रायपुर की यह घटना यह भी बताती है कि 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजी शासन के खिलाफ विरोध केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं था। छत्तीसगढ़ में भी सैनिकों और स्थानीय लोगों के बीच अंग्रेजी शासन के खिलाफ असंतोष मौजूद था।हनुमान सिंह और उनके साथियों की कहानी आज भी रायपुर के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। 1858 के उस विद्रोह में 17 सैनिकों ने फांसी का सामना किया, जबकि हनुमान सिंह अंग्रेजों की पकड़ से निकल गए। इसके बाद उनका जीवन कहां और कैसे बीता, इसका जवाब इतिहास के पन्नों में आज भी अधूरा है।

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