रायपुर: छत्तीसगढ़ में धान खरीदी को लेकर एक बार फिर सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सरकार ने भले ही किसानों की सुविधा के लिए 24 घंटे टोकन व्यवस्था लागू की हो, लेकिन हकीकत यह है कि महज पांच दिनों में ही एक महीने के स्लॉट फुल हो गए। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या सरकार ने खरीदी व्यवस्था को लेकर पहले से कोई ठोस तैयारी की थी?
लिमिट घटाई, परेशानी बढ़ाई?
किसान संगठनों और सहकारी समितियों का कहना है कि इस वर्ष धान खरीदी की दैनिक लिमिट 35 से 40 प्रतिशत तक घटा दी गई है। यदि टोकन 24 घंटे के लिए खोले गए, तो फिर खरीदी क्षमता क्यों नहीं बढ़ाई गई? सीमित लिमिट की वजह से समितियों में वेटिंग लगातार बढ़ रही है और किसानों को धान बेचने के लिए एक महीने तक इंतजार करना पड़ रहा है।
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74% धान अब भी पड़ा, जिम्मेदार कौन?
सरकारी आंकड़े ही व्यवस्था की पोल खोल रहे हैं। प्रदेश के 33 जिलों में अब तक 47.33 लाख टन धान की खरीदी हो चुकी है, लेकिन इसमें से 34.23 लाख टन धान का उठाव अब तक नहीं हुआ। यानी करीब 74 प्रतिशत धान अभी भी उपार्जन केंद्रों में पड़ा है। सवाल यह है कि जब समय पर उठाव नहीं हो रहा था, तो खरीदी की रफ्तार बढ़ाने की योजना क्यों नहीं बनाई गई?
सड़कों पर उतरे किसान, चेतावनी या मजबूरी?
सुकमा जिले के गादीरास खरीदी केंद्र में किसानों का सब्र टूट गया। लिमिट बढ़ाने की मांग को लेकर किसानों ने सुकमा-दंतेवाड़ा मुख्य सड़क जाम कर दी। किसानों का कहना है कि जहां पिछले साल दिसंबर तक 40 हजार क्विंटल धान खरीदा जा चुका था, वहीं इस बार महज 5 हजार क्विंटल खरीदी हुई है। क्या यह प्रशासनिक लापरवाही नहीं?
सरकार का दावा, लेकिन ज़मीनी हकीकत?
मार्कफेड के प्रबंध संचालक जितेंद्र शुक्ला का कहना है कि कलेक्टरों के प्रस्ताव के आधार पर लिमिट बढ़ाई जा रही है और मॉनिटरिंग के निर्देश दिए गए हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब खरीदी की अंतिम तारीख 31 जनवरी 2026 तय है, तब क्या इतने कम समय में सभी किसानों का धान खरीदा जा सकेगा?किसान संगठनों का कहना है कि अगर तुरंत लिमिट और उठाव नहीं बढ़ाया गया, तो सरकार के दावे सिर्फ कागज़ों तक ही सीमित रह जाएंगे।













