निशानेबाज न्यूज़ डेस्क : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने नेशनल हाईवे चौड़ीकरण के लिए अधिग्रहित भूमि के मुआवजे से जुड़े एक मामले में दायर आर्बिट्रेशन अपील को 221 दिन की देरी के कारण खारिज कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि केवल धनाभाव, कानूनी जानकारी की कमी या व्यक्तिगत परेशानियों जैसे सामान्य कारण इतनी लंबी देरी को माफ करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु की एकलपीठ में हुई।
क्या था भूमि अधिग्रहण विवाद
जांजगीर-चांपा जिले के सारागांव निवासी कुछ किसानों की जमीन नेशनल हाईवे चौड़ीकरण परियोजना के लिए अधिग्रहित की गई थी। वर्ष 2016 में पारित अवार्ड से असंतुष्ट होकर प्रभावित पक्षों ने नेशनल हाईवे एक्ट की धारा 3G(5) के तहत मध्यस्थ के समक्ष पुनर्मूल्यांकन की मांग रखी। मध्यस्थ ने 2017 में मुआवजे का पुनर्मूल्यांकन केंद्रीय मूल्यांकन बोर्ड, रायपुर के दिशा-निर्देशों के अनुसार करने का निर्देश दिया था।
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जिला न्यायालय से लेकर हाईकोर्ट तक
मध्यस्थ के आदेश को लोक निर्माण विभाग (राष्ट्रीय राजमार्ग) ने जिला न्यायालय में चुनौती दी, जहां 2019 में मध्यस्थ का आदेश निरस्त कर दिया गया। इसके बाद प्रभावित पक्षों ने हाईकोर्ट में अपील दायर की, लेकिन यह अपील निर्धारित समयसीमा से 221 दिन बाद दाखिल हुई।
देरी माफी की दलीलें खारिज
अपीलकर्ताओं ने लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 के तहत देरी माफी की मांग करते हुए आर्थिक तंगी, प्रक्रिया की जानकारी के अभाव और व्यक्तिगत कारणों का हवाला दिया। हालांकि हाईकोर्ट ने इन तर्कों को पर्याप्त नहीं माना और समयसीमा के पालन को अनिवार्य बताते हुए अपील खारिज कर दी।
समयसीमा पालन पर न्यायालय का संदेश
इस फैसले को भूमि अधिग्रहण और मुआवजा विवादों से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। न्यायालय ने स्पष्ट संकेत दिया है कि न्यायिक प्रक्रिया में देरी को हल्के में नहीं लिया जा सकता और निर्धारित कानूनी समयसीमा का पालन अनिवार्य है।











