निशानेबाज न्यूज़ डेस्क : भोपाल मेट्रो, जिसे शहर की आधुनिक परिवहन व्यवस्था का बड़ा कदम माना जा रहा था, अब शुरुआती दौर में ही आर्थिक चुनौतियों से जूझती नजर आ रही है। महज तीन महीनों के भीतर मेट्रो की आय और खर्च के बीच बड़ा अंतर सामने आया है, जिसने इसकी व्यवहारिकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
खर्च के मुकाबले बेहद कम आमदनी
मेट्रो संचालन पर रोजाना करीब 8 लाख रुपये का खर्च आ रहा है, जबकि आमदनी केवल 13 से 15 हजार रुपये तक सीमित है। यानी रोजाना लाखों का घाटा उठाना पड़ रहा है, जो किसी भी सार्वजनिक परियोजना के लिए चिंताजनक संकेत है।
लगातार घट रही यात्रियों की संख्या
शुरुआती दिनों में भोपाल मेट्रो को लेकर लोगों में काफी उत्साह था और करीब 7 हजार यात्री रोज सफर कर रहे थे। लेकिन समय के साथ यह संख्या तेजी से घटती गई और अब हालात यह हैं कि रोजाना केवल 100 से 150 यात्री ही मेट्रो का उपयोग कर रहे हैं।
Read more : M.P Crime : रीवा में अवैध शराब का कारोबार बेखौफ, पुलिस पर उठे सवाल
फेरों और समय में बार-बार बदलाव
यात्रियों की कमी के चलते मेट्रो के संचालन में कई बदलाव किए गए हैं। शुरुआत में जहां 17 फेरे लगाए जाते थे, उसे घटाकर पहले 13 और अब 9 कर दिया गया है।साथ ही मेट्रो का संचालन समय भी सीमित कर दिया गया है—अब यह सेवा सुबह 11:30 बजे से शाम 4:30 बजे तक ही उपलब्ध है।
प्रबंधन पर बढ़ा दबाव
कम होती मांग के कारण मेट्रो प्रबंधन को अपने ऑपरेशनल फैसलों पर लगातार पुनर्विचार करना पड़ रहा है। खर्च और आय के बीच बढ़ता अंतर इस प्रोजेक्ट की आर्थिक स्थिरता पर सवाल खड़े कर रहा है।
क्या हैं संभावित कारण?
विशेषज्ञों के अनुसार, सीमित रूट, कम कनेक्टिविटी, समय का दायरा और लोगों की आदतें भी यात्रियों की संख्या कम होने के प्रमुख कारण हो सकते हैं। जब तक मेट्रो का विस्तार और बेहतर कनेक्टिविटी नहीं होगी, तब तक यात्रियों की संख्या बढ़ना मुश्किल माना जा रहा है।
आगे की चुनौती
भोपाल मेट्रो के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब यात्रियों को आकर्षित करना और संचालन को आर्थिक रूप से संतुलित बनाना है।









