भोपाल : भोपाल एम्स की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रश्मि वर्मा का मामला अब केवल आत्महत्या के प्रयास या मेडिकल इमरजेंसी तक सीमित नहीं रहा। यह केस देश के हेल्थ सिस्टम में डॉक्टरों के मानसिक स्वास्थ्य, प्रशासनिक दबाव और कथित टॉक्सिक वर्क कल्चर को लेकर गंभीर बहस का कारण बन गया है। हालात की संवेदनशीलता को देखते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय स्तर पर भी मामले की निगरानी शुरू कर दी गई है।
पांच वरिष्ठ अधिकारियों की फैक्ट फाइंडिंग कमेटी गठित
एम्स प्रबंधन ने इस पूरे घटनाक्रम की जांच के लिए पांच वरिष्ठ अधिकारियों की फैक्ट फाइंडिंग कमेटी का गठन किया है। कमेटी को विभागीय कार्यसंस्कृति, प्रशासनिक दबाव, नोटिस कल्चर और संभावित वर्क प्लेस स्ट्रेस की गहन जांच का जिम्मा सौंपा गया है। जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।
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नींद की दवा के बाद एनेस्थीसिया इंजेक्ट करने का खुलासा
एम्स सूत्रों के अनुसार, डॉ. रश्मि वर्मा ने पहले नींद की दवा ली थी, इसके बाद एनेस्थीसिया का हाई डोज इंजेक्ट किया गया। बताया गया कि इंजेक्शन के बाद करीब 7 मिनट तक उनका दिल धड़कना बंद रहा, जिससे शरीर में ऑक्सीजन की आपूर्ति बाधित हो गई।
एमआरआई रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता
घटना के 72 घंटे बाद आई एमआरआई रिपोर्ट में “ग्लोबल हाइपोक्सिया ब्रेन” की पुष्टि हुई है। डॉक्टरों के मुताबिक, यह स्थिति तब होती है जब लंबे समय तक मस्तिष्क को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती। इससे ब्रेन सेल्स को गंभीर नुकसान पहुंचता है और रिकवरी अनिश्चित हो सकती है। विशेषज्ञ इसे बेहद संवेदनशील और गंभीर मेडिकल इमरजेंसी मानते हैं।
एम्स में आपात बैठक, बड़े प्रशासनिक फैसले
मामले की गंभीरता को देखते हुए छुट्टी के दिन एम्स प्रबंधन और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की आपात बैठक हुई। बैठक के बाद संबंधित विभाग के एचओडी को हटाया गया, विभाग को दो हिस्सों में बांटा गया और पूरे मामले की गोपनीय हाई लेवल जांच के आदेश दिए गए।
बर्थडे सेलिब्रेशन के बाद सुसाइड अटेंप्ट
जानकारी के अनुसार, सुसाइड अटेंप्ट से कुछ समय पहले एम्स परिसर में डॉ. रश्मि का जन्मदिन मनाया गया था। इसके बाद अचानक हुई इस घटना ने सहकर्मियों और परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया।
डॉक्टरों के मानसिक स्वास्थ्य पर बड़ा सवाल
यह मामला अब देशभर में डॉक्टरों की मानसिक स्थिति, संस्थानों के वर्क कल्चर और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस केस से हेल्थ सिस्टम में जरूरी सुधारों की दिशा तय हो सकती है।













