जगदलपुर – छत्तीसगढ़ के बस्तर का महापर्व दशहरा रविवार रात से आरंभ हो गया। इस महापर्व की शुरुआत हर साल काछन गादी नामक अनूठी रस्म से होती है, जो करीब 700 साल पुरानी है।
परंपरा का महत्व:
- इस रस्म में अनुसूचित जाति के एक विशेष परिवार की नाबालिग कुंवारी कन्या कांटो से बने झूले पर लेटती हैं।
- इस प्रक्रिया को “काछनदेवी” कहा जाता है।
- मान्यता है कि कन्या के माध्यम से देवी स्वयं प्रकट होकर महापर्व को सुरक्षित और सफल बनाने का आशीर्वाद देती हैं।
इस वर्ष:
- इस बार पीहू ने काछनदेवी का रूप धारण किया और पर्व आरंभ करने की अनुमति दी।
- काछन गुड़ी परिसर में बस्तर राजपरिवार, स्थानीय जनप्रतिनिधि और हजारों श्रद्धालु इस अनूठी रस्म के साक्षी बने।
- वातावरण परंपरागत वाद्य-ध्वनियों और जयकारों से गूंज उठा।
खास बात:
- यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि बस्तर दशहरा की संस्कृति और ऐतिहासिक महत्व को भी दर्शाती है।
- 700 साल पुरानी यह रस्म आज भी उतनी ही श्रद्धा और भक्ति के साथ निभाई जाती है।













