Supreme Court Compensation Penalty : नई दिल्ली (03 मार्च 2026): सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में व्यवस्था दी है कि यदि किसी दुर्घटना की स्थिति में नियोक्ता (Employer) मुआवजे की राशि जमा करने में एक महीने से अधिक की देरी करता है, तो अधिनियम के तहत लगाए गए जुर्माने का भुगतान स्वयं नियोक्ता को ही करना होगा। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी.बी. वराले की पीठ ने कहा कि बीमा कंपनी मुआवजे और ब्याज के लिए तो जिम्मेदार हो सकती है, लेकिन देरी के कारण लगने वाला जुर्माना नियोक्ता की व्यक्तिगत वैधानिक विफलता है।
क्या था मामला? यह मामला 2017 का है, जब एक कमर्शियल ड्राइवर की ड्यूटी के दौरान मौत हो गई थी। दिल्ली के श्रम विभाग के आयुक्त ने 2020 में नियोक्ता को ₹7,36,680 का मुआवजा देने का आदेश दिया था। चूंकि वाहन का बीमा था, इसलिए नियोक्ता को यह राशि बीमा कंपनी से प्राप्त करने की अनुमति दी गई। हालांकि, समय पर मुआवजा न देने के कारण आयुक्त ने नियोक्ता पर 35% का जुर्माना (₹2,57,838) भी लगाया था। दिल्ली हाई कोर्ट ने पिछले साल इस जुर्माने की जिम्मेदारी भी बीमा कंपनी पर डाल दी थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
कोर्ट का तर्क: सामाजिक कल्याण सर्वोपरि सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश को पलटते हुए कहा कि ‘कर्मचारी मुआवजा अधिनियम’ एक सामाजिक कल्याण कानून है, जिसका उद्देश्य दुर्घटना के शिकार कर्मचारियों या उनके परिजनों को त्वरित आर्थिक सहायता पहुँचाना है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिनियम की धारा 4A के तहत मुआवजे का भुगतान एक महीने के भीतर करना नियोक्ता का कानूनी दायित्व है। इस वैधानिक दायित्व की अनदेखी करने पर लगने वाला जुर्माना किसी भी संविदात्मक समझौते (Contractual Obligation) के माध्यम से बीमा कंपनी पर नहीं थोपा जा सकता।
बीमा कंपनी को मिली राहत पीठ ने अपने फैसले में कहा कि बीमा कंपनी ने पहले ही मुआवजा और ब्याज देने की अपनी जिम्मेदारी स्वीकार कर ली थी। लेकिन देरी का जुर्माना नियोक्ता की लापरवाही का परिणाम था। कोर्ट ने प्रतिवादी (नियोक्ता) को आदेश दिया कि वह आठ सप्ताह के भीतर ₹2,57,838 की जुर्माने की राशि का भुगतान करे। इस फैसले से भविष्य में नियोक्ताओं के बीच कर्मचारियों को समय पर मुआवजा सुनिश्चित करने का कड़ा संदेश जाएगा।











