Avimukteshwaranand Controversy 2026 : नई दिल्ली/प्रयागराज: माघ मेले में पालकी पर सवार होकर संगम स्नान के लिए जाने से रोके गए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का धरना आज पांचवें दिन भी जारी रहा। कड़ाके की ठंड और बुखार के बावजूद स्वामी अपनी मांग पर अड़े हैं कि जब तक मेला प्रशासन माफी नहीं मांगता, वे स्नान नहीं करेंगे। लेकिन यह लड़ाई अब केवल एक पालकी या प्रोटोकॉल की नहीं रही, बल्कि इसने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया ध्रुवीकरण पैदा कर दिया है।
संघ और बीजेपी की वैचारिक एकजुटता: इस विवाद ने एक महत्वपूर्ण राजनीतिक तथ्य को उजागर किया है—वह है संघ और भाजपा के बीच की अटूट वैचारिक कड़ी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जब अविमुक्तेश्वरानंद को इशारों-इशारों में ‘कालनेमि’ (रामायण का वह असुर जो साधु का वेश धरकर आया था) कहा, तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ नेता इंद्रेश कुमार ने भी इसका समर्थन किया। इंद्रेश कुमार का यह बयान कि “देवताओं के वास में राक्षसी ताकतें ज्यादा देर नहीं चलतीं”, यह स्पष्ट करता है कि संघ अब इस मामले में सरकार के साथ पूरी मजबूती से खड़ा है।
राजनीति के चक्रव्यूह में फंसे स्वामी: अविमुक्तेश्वरानंद की सबसे बड़ी चुनौती उनकी राजनीतिक छवि बनती जा रही है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव की सहानुभूति ने उन्हें भाजपा के लिए एक ‘राजनीतिक प्रतिद्वंदी’ के रूप में स्थापित कर दिया है। योगी आदित्यनाथ का तर्क है कि एक संन्यासी के लिए राष्ट्र और धर्म सर्वोपरि होना चाहिए, जबकि स्वामी का पलटवार है कि एक व्यक्ति एक साथ मुख्यमंत्री और धर्माचार्य नहीं हो सकता। इस खींचतान में अविमुक्तेश्वरानंद न केवल संघ के निशाने पर आए हैं, बल्कि संत समाज का एक बड़ा वर्ग भी उनसे किनारा करता दिख रहा है।
धर्म और राजनीति का घालमेल: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद, ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य हैं, जो खुद भी अपने राजनीतिक झुकाव के लिए चर्चा में रहते थे। गुरु की राह पर चलते हुए अविमुक्तेश्वरानंद भी अब राजनीति के सक्रिय पक्षकार बनते जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब कोई धर्माचार्य राजनीतिक पाले चुनता है, तो उसे दूसरे पक्ष की मार भी झेलनी पड़ती है। प्रशासन द्वारा उनके शंकराचार्य होने का सबूत मांगना इसी प्रशासनिक और राजनीतिक घेराबंदी का हिस्सा माना जा रहा है।
निष्कर्ष: आदि शंकराचार्य ने सनातन धर्म की रक्षा के लिए चार पीठों की स्थापना की थी, लेकिन मौजूदा विवाद ने ‘संघ-बीजेपी’ को एक ऐसी अभेद्य वैचारिक पीठ के रूप में पेश कर दिया है, जहाँ धर्म और सत्ता के हित एक साथ चलते हैं। अविमुक्तेश्वरानंद इस समय एक ऐसे मोड़ पर हैं जहाँ उन्हें न तो पूर्ण धार्मिक समर्थन मिल रहा है और न ही कोई ठोस राजनीतिक सुरक्षा कवच।











