Dabra MP News : झोलाछाप डॉक्टरों का साम्राज्य, स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी ने खोले कई राज
Dabra MP News : डबरा। शहर के हर नुक्कड़ और गली में “मौत का धंधा” फल-फूल रहा है। बिना डिग्री, बिना मेडिकल ट्रेनिंग और बिना किसी सरकारी अनुमति के लोग अपने-आप को डॉक्टर बताकर मरीजों का इलाज कर रहे हैं। हालत यह है कि ये झोलाछाप डॉक्टर न केवल बड़ों की, बल्कि नवजात मासूमों की जिंदगी से भी खिलवाड़ कर रहे हैं।
दवा और इंजेक्शन का पहाड़ — खुलेआम नाले में फेंका गया मेडिकल वेस्ट
हमारी टीम ने बीच बाजार और आबादी वाले इलाके के पास ऐसे नाले देखे जिनमें सैकड़ों इस्तेमाल की हुई सिरिंज, इंजेक्शन शीशियां, और दवाई के पत्ते फेंके गए थे। इनमें से कई इंजेक्शन ऐसे हैं जो सिर्फ प्रशिक्षित डॉक्टर और अस्पताल में ही इस्तेमाल हो सकते हैं। खुले में पड़ा यह मेडिकल वेस्ट न सिर्फ कानून का उल्लंघन है, बल्कि गंभीर संक्रमण और महामारी फैलाने का खतरा भी पैदा करता है।
कथित “डॉक्टर” का क्लिनिक — बिना योग्यता, मरीजों पर प्रयोग
दूसरी तस्वीर में जिस व्यक्ति को आप कंप्यूटर पर बैठा देख रहे हैं, वह कोई रजिस्टर्ड डॉक्टर नहीं, बल्कि एक स्थानीय युवक है जो खुद को पैथोलॉजी लैब संचालक बताता है। यहां मरीजों की जांच और दवाएं दोनों दी जाती हैं, लेकिन किसी भी सरकारी पंजीयन या सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया जाता।
दुकान में छिपा “नकली अस्पताल”
एक और जांच में हमने पाया कि कस्बे के बीचों-बीच एक दोमंजिला इमारत में ऊपर मोबाइल और कपड़ों की दुकानें हैं, लेकिन नीचे एक अवैध मेडिकल सेंटर चल रहा है। यहां हर बीमारी का इलाज दावा किया जाता है, इंजेक्शन और ड्रिप लगाई जाती हैं, जबकि न तो यहाँ डॉक्टर हैं, न नर्स, न ही कोई आपात सुविधा।
मासूम की जिंदगी पर खेल
हमारे कैमरे में कैद यह तस्वीर दिल दहला देने वाली है। एक नवजात बच्चे के हाथ में इंजेक्शन का कैनुला लगा है, लेकिन इलाज किसी सरकारी या रजिस्टर्ड अस्पताल में नहीं, बल्कि झोलाछाप के पास हो रहा था। यह बच्चे की जिंदगी को सीधे खतरे में डालने जैसा है।
मौत के सौदागर और विभाग की चुप्पी
कुछ दिन पहले गलत इंजेक्शन से एक बुजुर्ग की मौत हो गई। कल ही 12 साल के मासूम की जान चली गई। अब, नवजात बच्चों को बिना योग्यता वाले लोग इंजेक्शन लगा रहे हैं। यह मेडिकल प्रैक्टिस एक्ट और बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट नियमों की सीधी अवहेलना है।
जब हमने इस पर जिला सीएमएचओ सचिन श्रीवास्तव से सवाल किया, तो उन्होंने सवाल सुनते ही फोन काट दिया। इससे साफ है कि या तो विभाग की जांच सतही है, या फिर किसी स्तर पर संरक्षण मिल रहा है।
BMO आलोक त्यागी का कहना है कि “सीएमएचओ की टीम कार्रवाई कर रही है”, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि अवैध क्लिनिक आज भी मरीजों की जान से खेल रहे हैं।
राजनीतिक संरक्षण का खुला खेल
जब संवाददाता ने एक अस्पताल संचालक से जवाब मांगा, तो उसने खुलेआम विधायक मोहान सिंह राठौड़ का नाम लेकर धमकी दी — “तुम कर लेना क्या करोगे!”। यह बयान बताता है कि राजनीति और झोलाछाप डॉक्टरों के बीच गहरी सांठगांठ है, जिसके कारण कार्रवाई अधर में लटकी रहती है।
कानून क्या कहता है?
इंडियन मेडिकल काउंसिल एक्ट, 1956 के तहत बिना रजिस्टर्ड डिग्री के इलाज करना अपराध है। बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट नियम, 2016 के तहत मेडिकल वेस्ट को खुले में फेंकना दंडनीय अपराध है, जिसके लिए 1 से 5 साल की सजा हो सकती है।
जनता के सवाल —
1. क्या जिला प्रशासन को मासूमों की मौतें दिखती नहीं?
2. क्यों इन अवैध अस्पतालों पर तुरंत कार्रवाई नहीं होती?
3. क्या राजनीतिक दबाव में विभाग मौत के सौदागरों को बचा रहा है?
यह सिर्फ खबर नहीं, चेतावनी है।
अगर जल्द कार्रवाई नहीं हुई, तो डबरा में एक बड़ी स्वास्थ्य आपदा होना तय है।
अब जिम्मेदारी जनता और प्रशासन — दोनों की है, कि इस मौत के कारोबार को रोका जाए।











