Tikamgarh Manuscripts: टीकमगढ़ बना भारतीय ज्ञान परंपरा का नया केंद्र, मिलीं 825 दुर्लभ हस्तलिखित पांडुलिपियां; 10 फीट लंबा ग्रंथ और जम्बूद्वीप का रहस्यमयी नक्शा बने आकर्षण

Anuj Nirala

Tikamgarh Manuscripts:जमील खान \टीकमगढ़। मध्य प्रदेश का टीकमगढ़ जिला इन दिनों भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है। जिले से 825 दुर्लभ हस्तलिखित पांडुलिपियों का संग्रह सामने आया है, जिन्हें भारतीय इतिहास, दर्शन, गणित, ज्योतिष, चिकित्सा और संस्कृति की अमूल्य धरोहर माना जा रहा है। इन पांडुलिपियों में 10 फीट लंबी हस्तलिखित पांडुलिपि और जैन ब्रह्मांड विज्ञान (जम्बूद्वीप) का अत्यंत दुर्लभ मानचित्र विशेष आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह खोज भारतीय ज्ञान-विज्ञान की उन परंपराओं पर नई रोशनी डालेगी, जो अब तक इतिहास के पन्नों में दबकर रह गई थीं।

इन दुर्लभ पांडुलिपियों का संरक्षण और डिजिटलीकरण केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना के तहत किया जा रहा है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस अमूल्य धरोहर का अध्ययन कर सकें। इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और शोधकर्ताओं के लिए यह संग्रह भविष्य में एक महत्वपूर्ण शोध आधार साबित होगा।

10 फीट लंबी पांडुलिपि और जम्बूद्वीप का नक्शा सबसे खास

Tikamgarh Manuscripts: टीकमगढ़ में मिली पांडुलिपियों में सबसे अधिक आकर्षण का केंद्र 10 फीट लंबी हस्तलिखित पांडुलिपि और जैन ब्रह्मांड विज्ञान का प्राचीन जम्बूद्वीप मानचित्र है। विशेषज्ञों के अनुसार कागज, लिपि और चित्रांकन की शैली के आधार पर यह मानचित्र 18वीं से 19वीं शताब्दी के बीच का प्रतीत होता है।

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इस प्राचीन मानचित्र के केंद्र में एक वृत्ताकार संरचना बनाई गई है, जिसके चारों ओर पर्वत श्रृंखलाएं, द्वीप और प्राचीन भू-भाग अत्यंत बारीकी से दर्शाए गए हैं। यह केवल धार्मिक चित्र नहीं, बल्कि उस समय के भारतीय भूगोल, गणित, ज्यामिति और दर्शन की गहरी समझ का उत्कृष्ट प्रमाण माना जा रहा है।

भारतीय ज्ञान-विज्ञान का अनमोल दस्तावेज

Tikamgarh Manuscripts: विशेषज्ञों का कहना है कि प्राचीन काल में जैन आचार्य ब्रह्मांड विज्ञान को समझाने के लिए इस प्रकार के चित्रात्मक मानचित्र तैयार करते थे। विश्व के कई प्रमुख संग्रहालयों में भी इस प्रकार के जैन कॉस्मोलॉजिकल मानचित्रों को भारतीय सांस्कृतिक विरासत की अमूल्य धरोहर के रूप में संरक्षित किया गया है।

टीकमगढ़ में मिला यह दुर्लभ नक्शा दर्शाता है कि सदियों पहले भारतीय विद्वानों को भूगोल, गणित और ब्रह्मांडीय संरचना की गहरी समझ थी। शोधकर्ताओं के अनुसार यह खोज भारतीय ज्ञान परंपरा के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को समझने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

धर्म से लेकर चिकित्सा और ज्योतिष तक का विशाल ज्ञान भंडार

मिली हुई 825 हस्तलिखित पांडुलिपियों में केवल धार्मिक ग्रंथ ही नहीं, बल्कि दर्शन, आयुर्वेद, चिकित्सा विज्ञान, ज्योतिष, गणित, भूगोल, साहित्य, समाजशास्त्र और भारतीय जीवन पद्धति से जुड़े अनेक दुर्लभ विषयों का विस्तृत वर्णन भी मौजूद है। इन ग्रंथों के अध्ययन से भारतीय ज्ञान प्रणाली के कई ऐसे पहलू सामने आने की उम्मीद है, जिन पर अब तक सीमित शोध हुआ है।

ज्ञान भारतम ऐप पर हो रहा डिजिटलीकरण

Tikamgarh Manuscripts: केंद्र सरकार द्वारा भारतीय पांडुलिपियों के संरक्षण और डिजिटलीकरण के लिए ‘ज्ञान भारतम ऐप’ के माध्यम से देशभर में अभियान चलाया जा रहा है। इस डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अब तक सैकड़ों दुर्लभ पांडुलिपियों को ऑनलाइन दर्ज किया जा चुका है, जबकि अनेक पांडुलिपियों को भारत ज्ञान मंडल की स्वीकृति भी मिल चुकी है।

इस ऐप की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि दुनिया का कोई भी शोधकर्ता, विद्यार्थी या इतिहासकार लेखक, विषय, शीर्षक या भाषा के आधार पर इन पांडुलिपियों की जानकारी प्राप्त कर सकता है। इससे भारतीय ज्ञान परंपरा वैश्विक स्तर पर अध्ययन और शोध के लिए आसानी से उपलब्ध हो रही है।

पांडुलिपियों के संरक्षण में मध्य प्रदेश बना देश का नंबर-1 राज्य

भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में मध्य प्रदेश ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। ज्ञान भारतम ऐप पर दुर्लभ पांडुलिपियों का सबसे अधिक पंजीकरण कर मध्य प्रदेश देश में पहले स्थान पर पहुंच गया है।

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अब तक प्रदेश में 34 लाख 45 हजार 439 पांडुलिपि पृष्ठों का पंजीकरण किया जा चुका है। इनमें से 12 लाख 13 हजार 127 पांडुलिपियों का सत्यापन भी पूरा हो चुका है, जबकि शेष पांडुलिपियों के सत्यापन की प्रक्रिया जारी है।

टीकमगढ़ बनेगा शोध और अध्ययन का नया केंद्र

Tikamgarh Manuscripts: विशेषज्ञों का मानना है कि टीकमगढ़ में मिली ये दुर्लभ पांडुलिपियां भारतीय इतिहास, संस्कृति और ज्ञान-विज्ञान के अध्ययन में नई दिशा देंगी। इनके डिजिटलीकरण से न केवल देश बल्कि विदेशों के शोधकर्ताओं को भी भारतीय प्राचीन ज्ञान प्रणाली का अध्ययन करने का अवसर मिलेगा।

इतिहासकारों का विश्वास है कि यह खोज भविष्य में टीकमगढ़ को देश के प्रमुख पांडुलिपि संरक्षण, भारतीय ज्ञान परंपरा और प्राचीन अध्ययन केंद्र के रूप में नई पहचान दिलाएगी। यह उपलब्धि न केवल मध्य प्रदेश बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का विषय है और भारतीय सभ्यता की समृद्ध बौद्धिक विरासत को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।

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