Chhattisgarh Forest Department: रायपुर। क्या छत्तीसगढ़ के वन विभाग में नियम सिर्फ आम कर्मचारियों के लिए हैं और प्रभावशाली लोगों के लिए अलग व्यवस्था चलती है? क्या अनुकंपा नियुक्ति जैसी संवेदनशील व्यवस्था का भी इस्तेमाल मनचाहे तरीके से सरकारी नौकरी हासिल करने के लिए किया गया? क्या मंत्रालय में वर्षों तक एक अधिकारी को विशेष संरक्षण मिलता रहा और शिकायतों के बावजूद शासन आंखें मूंदे बैठा रहा? ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि वन विभाग के तकनीकी अधिकारी श्रीधर नायडू से जुड़ा मामला अब केवल एक नियुक्ति विवाद नहीं, बल्कि विभागीय जवाबदेही, प्रशासनिक पारदर्शिता और शासन की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल बन गया है।
आरोप है कि श्रीधर नायडू को उनके पिता की मृत्यु के करीब सात वर्ष बाद अनुकंपा नियुक्ति दी गई। सबसे गंभीर बात यह बताई जा रही है कि जिस मानचित्रकार (Cartographer) पद पर नियुक्ति दी गई, उस पद पर तत्कालीन अविभाजित मध्यप्रदेश के नियमों और बाद के प्रावधानों में अनुकंपा नियुक्ति का कोई प्रावधान ही नहीं था। सवाल सीधा है—जब नियम ही नहीं थे तो नियुक्ति किस कानूनी आधार पर दी गई? यह बड़ा सवाल है।
मामले का दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण पहलू पात्रता से जुड़ा है। आरोपों के अनुसार, नियुक्ति के समय श्रीधर नायडू की माता वन विभाग में उच्च श्रेणी लिपिक के पद पर कार्यरत थीं। सामान्यतः अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य उस परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता देना होता है, जिसका एकमात्र कमाऊ सदस्य सेवा के दौरान निधन हो जाए। ऐसे में यदि परिवार का कोई सदस्य पहले से नियमित सरकारी सेवा में था, तो अनुकंपा नियुक्ति की पात्रता कैसे तय हुई? क्या विभाग ने अपने ही नियमों को नजरअंदाज किया या फिर किसी प्रभाव में निर्णय लिया गया?
दस्तावेजों के हवाले से यह भी दावा किया जा रहा है कि विभाग के उच्च स्तर पर यह स्वीकार किया गया था कि मानचित्रकार पद पर अनुकंपा नियुक्ति का कोई प्रावधान नहीं है। इसके बावजूद नियुक्ति न केवल बरकरार रही, बल्कि संबंधित अधिकारी को समय-समय पर पदोन्नति भी मिलती रही और वे वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी के पद तक पहुंच गए। यदि नियुक्ति की नींव ही विवादित थी, तो उस आधार पर मिली पदोन्नतियों की वैधता पर भी स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठते हैं।
विवाद केवल नियुक्ति तक सीमित नहीं है। आरोप यह भी हैं कि श्रीधर नायडू का मूल पद प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) कार्यालय में होने के बावजूद उन्हें वर्षों तक मंत्रालय में अटैच रखा गया। मंत्रालय में उन्हें कथित रूप से ओएसडी जैसी जिम्मेदारियां भी सौंपी गईं। सवाल यह है कि क्या किसी तकनीकी अधिकारी को इस प्रकार मंत्रालय में लंबे समय तक पदस्थ रखने का कोई वैधानिक प्रावधान था? यदि विभाग में उनसे वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे तो फिर विशेष जिम्मेदारी केवल उन्हें ही क्यों दी गई?
Chhattisgarh Forest Department: शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि इस पूरे मामले की शिकायतें कई बार पीसीसीएफ, सचिव और प्रमुख सचिव स्तर तक पहुंचीं, लेकिन हर बार फाइलें आगे बढ़ने के बजाय ठंडे बस्ते में डाल दी गईं। जांच पूरी कर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? यह चुप्पी अपने आप में कई सवाल खड़े करती है।
Chhattisgarh Forest Department: सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार एक और गंभीर आरोप यह भी लगाया गया है कि मंत्रालय में पदस्थ रहने के दौरान वन भूमि, गैर-वन भूमि, एनओसी और पर्यावरणीय स्वीकृतियों से जुड़े मामलों में कथित प्रभाव का इस्तेमाल किया गया। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन यदि इतने गंभीर आरोप लगातार लगाए जाते रहे, तो शासन और विभाग की जिम्मेदारी थी कि निष्पक्ष जांच कर तथ्य सार्वजनिक करता। ऐसा न होने से संदेह और गहरा होता जा रहा है।
शिकायत में यह भी आरोप है कि संबंधित अधिकारी को बिना स्पष्ट वैधानिक पात्रता के सरकारी वाहन सहित अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं। यह केवल सेवा नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि सरकारी संसाधनों के उपयोग पर भी गंभीर सवाल खड़ा करता है।
पूरा मामला अब केवल एक अधिकारी तक सीमित नहीं रह गया है। असली सवाल शासन स्तर के उन अधिकारियों और प्रशासनिक व्यवस्था पर है जिन्होंने वर्षों तक इस नियुक्ति, पदस्थापना और सुविधाओं पर कभी आपत्ति नहीं जताई। यदि नियुक्ति नियमों के अनुरूप थी तो शासन को सभी दस्तावेज सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। लेकिन यदि नियुक्ति और बाद की कार्रवाई में नियमों की अनदेखी हुई है तो केवल संबंधित अधिकारी ही नहीं, बल्कि उस पूरी प्रशासनिक श्रृंखला की जवाबदेही तय होनी चाहिए जिसने कथित तौर पर इस व्यवस्था को संरक्षण दिया। इस मामले में पीसीसीएफ अरुण कुमार पाण्डेय से उनका पक्ष जानने के लिए संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनसे बात नहीं हो सकी।
Chhattisgarh Forest Department: अब नजर राज्य सरकार पर है। क्या सरकार इस पूरे मामले की स्वतंत्र, समयबद्ध और निष्पक्ष जांच कराएगी? क्या नियुक्ति से लेकर पदोन्नति, मंत्रालय में अटैचमेंट, विशेष जिम्मेदारियों और सरकारी सुविधाओं तक हर पहलू की जांच होगी? या फिर यह मामला भी उन फाइलों में शामिल हो जाएगा, जो वर्षों तक दफ्तरों की अलमारियों में धूल फांकती रहती हैं।







