निशानेबाज न्यूज़ डेस्क : देश में स्मार्ट गांव और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के दावे भले ही किए जा रहे हों, लेकिन बड़वानी जिले के पाटी ब्लॉक की ग्राम पंचायत पीपरकुंड इन दावों की सच्चाई सामने ला रही है। यहां आज भी मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए एम्बुलेंस नहीं, बल्कि इंसानों के कंधों का सहारा लेना पड़ता है।
7 किलोमीटर का खतरनाक सफर
करीब 55 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव की आबादी लगभग 8 हजार है, जबकि कुंडिया फलिया में 100 से अधिक परिवार रहते हैं। बावजूद इसके, यहां तक पहुंचने के लिए 7 किलोमीटर लंबा कच्चा और उबड़-खाबड़ रास्ता ही एकमात्र विकल्प है।इस रास्ते पर न तो चार पहिया वाहन चल सकते हैं और न ही एम्बुलेंस पहुंच पाती है।
मजबूरी में कंधों पर ढोए जाते हैं मरीज
ऐसे में ग्रामीण बीमारों को कपड़े की झोली में डालकर कंधों पर उठाकर पक्के रास्ते तक ले जाते हैं। यह दृश्य न केवल दर्दनाक है, बल्कि व्यवस्था की बड़ी विफलता को भी उजागर करता है।
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रात और बारिश में बढ़ जाती है मुश्किल
ग्रामीणों के मुताबिक रात के समय हालात और भी खतरनाक हो जाते हैं। जंगल का इलाका, अंधेरा और जंगली जानवरों का डर सफर को और कठिन बना देता है।वहीं बारिश के मौसम में नाले उफान पर होते हैं और रास्ता पूरी तरह फिसलन भरा हो जाता है। कई बार लोग मरीज को ले जाने के लिए सुबह होने का इंतजार करते हैं, जो जानलेवा साबित हो सकता है।
“हर बार यही स्थिति बनती है”
गांव के निवासी प्रदीप बताते हैं कि हर बार मरीज को इसी तरह कंधों पर ले जाना पड़ता है। थकान और लाचारी के बीच उनकी यह बात व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करती है।
कई बार लगाई गुहार, नहीं मिला समाधान
ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार जनसुनवाई में आवेदन दिए और जनप्रतिनिधियों से मदद मांगी, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिला। उनका सवाल साफ है—जब वे भी वोट देते हैं, तो उन्हें बुनियादी सुविधाएं क्यों नहीं मिलतीं?
प्रशासन का दावा, जमीन पर इंतजार
एसडीएम भूपेंद्र रावत के अनुसार, धरती आभा योजना के तहत ऐसे गांवों को चिन्हित किया गया है और सड़क निर्माण प्रस्तावित है।हालांकि, ग्रामीणों के लिए यह अब भी इंतजार का ही विषय बना हुआ है।











