Train Molestation Case : नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक निलंबित पुलिस अधिकारी को अग्रिम जमानत देने के मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को खारिज कर दिया है। इस अधिकारी पर चलती ट्रेन में कानून की एक छात्रा के साथ यौन उत्पीड़न का आरोप है। शीर्ष अदालत ने कहा कि केवल विभागीय कार्रवाई या निलंबन के आधार पर आरोपी को गिरफ्तारी से सुरक्षा देना कानूनन सही नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के तर्क पर कड़ी आपत्ति जताई। हाईकोर्ट ने 7 जनवरी के अपने आदेश में कहा था कि क्योंकि हेड कांस्टेबल शेख अब्दुल्ला मोहम्मद को पहले ही निलंबित किया जा चुका है, इसलिए उसे हिरासत में लेकर पूछताछ की आवश्यकता नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को “अस्थिर” (unsustainable) बताते हुए कहा कि हाईकोर्ट का यह फैसला उन्हें तर्कसंगत नहीं लगा।
क्या है पूरा मामला? यह घटना दिसंबर 2025 की है, जब 23 वर्षीय कानून की छात्रा चेन्नई-कोयंबटूर इंटरसिटी ट्रेन में अकेले यात्रा कर रही थी। आरोपी पुलिसकर्मी शेख अब्दुल्ला मोहम्मद ड्यूटी से लौट रहा था, तभी उसने काटपाडी के पास छात्रा के साथ कथित तौर पर छेड़छाड़ की। छात्रा ने इस पूरी घटना का वीडियो अपने मोबाइल में रिकॉर्ड कर लिया और रेलवे पुलिस को सूचना दी, जिसके बाद आरोपी को हिरासत में लिया गया और बाद में निलंबित कर दिया गया।
कानूनी कार्रवाई और जन आक्रोश आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं 62, 75 और 304(2) के साथ-साथ तमिलनाडु महिला उत्पीड़न निषेध अधिनियम, 2002 के तहत मामला दर्ज किया गया है। चूंकि आरोपी खुद एक पुलिसकर्मी था, इसलिए इस घटना ने पूरे राज्य में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर भारी जन आक्रोश पैदा कर दिया था।
अब आगे क्या? सुप्रीम कोर्ट ने मामला वापस मद्रास हाईकोर्ट को भेज दिया है (Remanded) और निर्देश दिया है कि अधिकारी की अग्रिम जमानत याचिका पर गुण-दोष (Merits) के आधार पर फिर से नए सिरे से सुनवाई की जाए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दोनों पक्ष कानून के दायरे में अपने तर्क रखने के लिए स्वतंत्र हैं।









